What is the difference between denudation, weathering, mass wasting, erosion, disintegration, and decomposition

Earth surface (soils, rocks, etc.) is made up of biotic and abiotic components.

Disintegration - The process of rocky material breaking into pieces.
Decomposition - The process of organic substances breaking into pieces.

Weathering  = Disintegration or Decomposition or both - in situ (with little or no movement)

Weathering could be due to mechanical processes (frost action or frost shattering), chemical processes (water dissolving limestone), or biological processes (plants breaking up rocks).

Mass wasting - Transportation of rocks, soil, debris down the slope by gravity with no or little help of transporting agent 

Erosion = Transportation of rock material by water, wind, glaciers, waves, or gravity.

Denudation = Weathering + Erosion = Slopes (the land) being reduced in height and their shape modified.

So first happens the disintegration and decomposition of rocks in situ - these together are known as weathering - when the weathered material is transported from one place to another - this process is known as erosion - the effect of weathering and erosion is denudation (lowering and modification in shape) of earth's surface/landforms).



गंदे और बेशर्म हिंदुस्तानी

अच्छा, दिल्ली में क्या है, कि जिन लोगों के पास थोड़ा सा भी पैसा है, घरों में कुत्ते पालते हैं - कुत्ते को खिला तो देते हैं - अब खिलाया है तो थोड़ा बहुत निकालेगा भी - पूरे हिंदुस्तान में समस्या खाने की नहीं है, निकालने की है - हिन्दुस्तानियों को कहाँ निकालना है, नहीं मालूम - कहीं भी खोल कर खड़े हो जाते हैं या बैठ जाते हैं - जो खुद करते हैं वही कुत्ते को भी कराते हैं - कुत्ते को सुबह शाम निकल लेंगे लेकर - और सड़क चाहे साफ़ सुथरी हो गन्दी, कुत्ते को जहाँ मन आएगा, मालिक वही उसे करवा देगा - मोदी के स्वच्छ भारत में चार चाँद लगा देगा - और फिर पतली गली अपने घर में घुस जायेगा - ये तो है दिल्ली के पॉश इलाके की कहानी - उन इलाकों की क्या बात करें जहाँ अभी तक आदमी खुद का टॉयलेट नहीं बना पाया है - दुनिया में सबसे गंदे और बेशर्म हिंदुस्तानी ही होते है - इनमे सिविक सेंस नाम की कोई चीज नहीं है - गधे कहीं के - विश्व गुरु बनेंगे!

रिलीजियस फ्रीडम

रिलीजियस फ्रीडम के नाम पर ढोंगी हिन्दू, मुल्ले, मिशनरी, पादरी, नवबुद्धिस्ट पता नहीं क्या क्या कर रहे हैं। मुझे लगता है भारतीय स्टेट को रिलीजियस फ्रीडम को पूरी तरीके से खत्म कर देना चाहिए। पब्लिक स्पेस में हर प्रकार की रिलीजियस गतिविधि पर प्रतिबंध लगना चाहिए। नए मंदिरों मस्जिदों चर्चों गुरुद्वारों इत्यादि की स्थापना पर बैन लगा देना चाहिए। रिलीजियस उद्देश्य के लिए लाउडस्पीकर बजाने वालों को जेल में डालना चाहिए। सारे रिलीजियस स्कूल्स को तुरन्त बंद कर देना चाहिए। पब्लिक प्लेस में रिलीजियस गैदरिंग्स पर प्रतिबंध होना चाहिये। किसी बाबा पास्टर मिशनरी मुल्ला को पब्लिक प्लेस में लोगों की भीड़ जुटाने की इजाजत नहीं होनी चाहिए। रिलीजियस कन्वर्जन पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए। जो भी कन्वर्जन करता हुआ मिले या करवाता हुआ मिले, दोनों को जेल डालो। अभी रिलीजन पर शिकंजा नही कसा तो बदलती रिलीजियस डेमोग्राफी हिन्दुओं को अपने घर में ही बेघर कर देगी।

इंडियन बैंकिंग सिस्टम

आजकल ऐसा कोई दिन नहीं बीतता जिस दिन इंडियन बैंकिंग सिस्टम के लिए बेहतरीन शब्दों का इस्तेमाल नहीं करता। कभी एटीएम बिगड़ा है तो कभी पैसे नहीं है तो कभी डिमांड ड्राफ्ट बनाने में एक दिन लगा रहे हैं तो कभी कह रहे हैं दूसरे एटीएम से पैसे नहीं निकाल सकते तो कभी मेरी ऑनलाइन access खत्म कर देंगे तो कभी ओटीपी आने में १० मिनिट लगेगा तब तक आपका सेशन एक्सपायर हो जाएगा, तो कभी आपकी ट्रांसफर रिक्वेस्ट प्रोसेस ही नहीं होगी और दो तीन बार करने पर आपका एकांउट ऑनलाइन access ही ब्लॉक कर देंग। और हां हजार तरीके की सर्विस हैं, एक में कुछ एक हज़ार भेज सकते हैं, कुछ में रात के आठ बजे के बाद नहीं भेज सकते हैं कुछ में कुछ, कुछ में कुछ। दूसरी बैंक में भेजना हैं दूसरा ऑप्शन, अपनी बैंक के अपने खाते में भेजना उसके लिए दूसरा ऑप्शन, अपनी बैंक के दूसरे के खाते में भेजना है उसके लिए दूसरा ऑप्शन। सरकारी बैंकों के app देख लोगे तो बेहोश हो जाओगे। मतलब सारा काम गरीबों वाला विकासशील देशों वाला और चले हैं विश्व गुरु बनने। कहते हैं हम सॉफ्टवेयर में सबसे आगे हैं। हैं लीडर सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग में, और ढंग की वेबसाइट और app भी नहीं बना पा रहे हैं। बताओ ऐसा सिस्टम बना रखा है कि एक पेमेंट रिक्वेस्ट तक सही ढंग से प्रोसेस नहीं कर सकते। ऐसे ही थोड़े ही पूरी दुनिया इन्हें (हिन्दुस्तान को) थर्ड वर्ल्ड कहती है।

मुल्लों की यूनिवर्सिटी

जामिया में समाजशास्त्र की एक असिस्टेंट प्रोफेसर मिल गई। बात चलने लगी रिसर्च की। बात रोहिंग्या मुसलमानों तक पहुंची। कहने लगी भारत उनका होमलैंड है, उनको पनाह मिलनी चाहिए। हमने कहा ये वहां से हजारों किलोमीटर चल बॉर्डर पार कर जम्मू तक आ गए हैं तो थोड़ा और चलते तो उन्हें इस्लामिक गणराज्य मिल जाते। वहां आराम से रहते। ईरान, पाकिस्तान या अफ़ग़ानिस्तान जाकर भी तो पनाह ले सकते हैं, या फिर सिंगपुर चले जाए? क्या समस्या है वहां जाने में। रोहिंग्या और सीरियाई मुल्लों में कोई फर्क नहीं है। दोनों वहीं जा रहे हैं जहां सरकारें दयालु है और समाज सहनशील हैं। सीरियाई यूरोप और रोहिंग्या भारत। रोहिंग्या को पनाह देनी है या नहीं, ये भारत सरकार तय करेगी, मानवाधिकार संगठन नहीं। उनको रखने का खर्चा भारत सरकार की जेब से जाएगा, न कि विदेशी पैसे पर पल रहे मानवाधिकार संगठनों के खातों से। भारत कोई धर्मशाला नहीं है। तो कहने लगी कहने लगी ये तो संघी विचारधारा है। मैंने कुछ नहीं कहा, हंसता रहा। कहने लगीं हम तमिल बर्मीस है, भारत हमारी होमलैंड है, हमारे दादे परदादे को भारत सरकार को नागरिकता देनी पड़ी। तो मैंने कहा पहली बात तो रोहिंग्या भारतीय नहीं है। दूसरी बात अगर मान लो हैं भी, तो क्या आप होमलैंड वाला फॉर्मूला यहूदियों पर नहीं लगाएंगी। कहने लगी वो दूसरा मुद्दा है, इस्राएल यहूदी होमलैंड नहीं है, उन्होंने जबरदस्ती कब्जा किया हुआ है। फिर मैं मुस्कुराता रहा उनके दोगलेपन पर। जैसे ही संघी शब्द इस्तेमाल किया में समझ गया कि मैं किससे बात कर रहा हूं। फिर बात किसी और मुद्दे की तरफ चली गई। बाद में पता चला, किसी मुल्ले से शादी की थी, अब तलाकशुदा हैं, लड़कों को यूनियनबाजी करने के लिए भड़काती हैं, so-called एक्शन रिसर्च करवाती हैं, सबको हेल्लो नमस्ते की जगह सलाम कहती है (जो कि मुझे बड़ा अजीब लगा, जामिया में हिन्दू भी सलाम करते हैं।), रोहिंग्या मुल्लों के लिए बड़ा प्यार है।

How to master English langauage (for Hindi speakers)?

हिंदी माध्यम से पढ़े बच्चों की समस्या ये होती है कि उन्हें जिंदगी में कभी न कभी अंग्रेजी से दो चार होना ही पड़ता है चाहे उच्च शिक्षा में हो या कार्यस्थल पर - ऐसे बहुत से लोग मुझे मेसेज भेजते हैं और पूछते हैं कि अंग्रेजी कैसे सीखे - अब क्योंकि मैंने खुद बीए तक हिंदी माध्यम से पढाई की थी, मुझे मालूम है कि हिंदी माध्यम वालों को उच्च शिक्षा में, खासतौर पर शोध छात्रों कोे, सिर्फ अंग्रेजी पर पकड़ न होने के कारण किन किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है - ऐसे लोगों को मैं अपने अनुभवों के आधार पर सलाह देता हूँ - कि भई, प्रतिदिन अंग्रेजी में पढो, लिखो, सुनो और बोलो - शुरुआत में भले ही पांच मिनट ही करो, लेकिन जो करो रोजाना करो - और साथ ही अपनी प्रगति को प्रतिदिन किसी डायरी, नोटबुक, विडियो इत्यादि के जरिये नोट करते रहो ताकि ये पता चलता रहे कि आप कहाँ से कहाँ पहुचे हैं - मेहनत का कुछ असर पड़ा है या नहीं - वो सब जो आपको एक भाषा सीखने के लिए चाहिए, आजकल तो आपके फ़ोन में ही मुफ्त में उपलब्ध है - रेडियो, गाने, मूवीज, उपन्यास, कहानियों की किताबें, अखबार, विडियो रिकॉर्डर, एमएस वर्ड, वाइस रिकॉर्डर, ब्रिटिश कौंसिल से लेकर बीबीसी तक के अंग्रेजी सिखाने वाले एप्प और वेबसाइट - कहीं लाइब्रेरी, कोचिंग, यूनिवर्सिटी जाने की जरुरत नहीं है - लेकिन अक्सर मैंने देखा है कि उन्हें ये सारी सलाहें पसंद नहीं आती हैं क्योंकि वे त्वरित समाधान की खोज में निकले हुए होते हैं - वो चाहते है कि मैं कोई ऐसा फार्मूला दूँ कि एक ही सप्ताह में अंग्रेजी भाषा पर उनकी पकड़ शशि थरूर जैसी हो जाए - अब ऐसा कोई फार्मूला तो है नहीं - भाषा पर पकड़ बनाने में समय और निरंतर प्रयास की जरुरत होती है - सीखना है, पकड़ बनानी है, तो आपको प्रयास हर दिन करना होगा, हर क्षण करना होगा और लम्बे समय तक करना होगा

Noida slums and illegal Bangladeshis

नोएडा में झुग्गी झोपड़ी उजड़ने के बाद मुल्ले कह रहे हैं कि सरकार को नोटिस देने चाहिए था। क्यों भई, क्यों दे सरकार नोटिस? क्या तुमने दिया था सरकार को नोटिस, झुग्गी बनाने से पहले? नही न। सुना है ये मुल्ले उसी झुग्गी में एक मस्जिद भी खड़ी कर रहे थे। सोचो अगर मस्जिद तैयार हो जाती तो झुग्गी साफ करना कितना मुश्किल होता। उत्तर प्रदेश सरकार समय रहते बांग्लादेशी झुग्गी का सफाया करने के लिए बधाई की पात्र है। मैं तो चाहूंगा सरकार अन्य शहरों में भी यही अभियान चलाये और बांग्लादेशियों का सफाया करे।