मोदी, केजरीवाल और राहुल में से ही प्रधानमंत्री चुनना हो तो मेरा प्रधानमंत्री मोदी - क्यों?


मोदी, केजरीवाल और राहुल में से ही प्रधानमंत्री चुनना हो तो मेरा प्रधानमंत्री मोदी - क्यों? इंटरव्यू देखकर तो यही लगता है - अगर केजरीवाल को प्रधानमंत्री बना दे तो वो तो पांच साल एक्सपेरिमेंटशन में ही गुजार देंगे, हिन्दू मुसलमान करते हुए। और राहुल की बात ही छोड़ दो, विज़न तो है ही नहीं, मालूम ही नहीं है देश चलाना कैसे है, चलता कैसे है - देश को डेवलपमेंट की विंडो ऑफ़ ऑपर्चुनिटी मिली है उसको इस्तेमाल कैसे करना है - राष्ट्रीय सुरक्षा तो जैसे उनका मुद्दा ही नहीं है, विदेश नीति के बारे में सवाल ही न करो -किसानों की बात करते ही नहीं है - मज़दूरों को भी आरामपरस्त बना दिया है - खाली तिजोरी खोलकर धन की बरबादी करना उनके लिए विकास है - सबका यही हाल है - वेलफेयर स्टेट के नाम पर पैसा लुटाना। १२५ करोड़ का देश - शिक्षा तंत्र का हाल देखो - मुश्किल से ६०० शैक्षिणिक संस्थान (सब यूनिवर्सिटी कहलाने लायक नहीं है) है देश में - कोई सरकारी प्राइमरी स्कूल में अपने बच्चो को भेजना नहीं चाहता, कोई सरकारी अस्पताल में दवा लेने जाना नहीं चाहता - आज़ादी के ६० साल बाद भी अगर स्वास्थय उपकेन्द्र से सिरदर्द की एक गोली मांगने पर भी न मिले, तो काहे का विकास। कहते हैं - परिवर्तन धीरे धीरे आता है - परिवर्तन करना ही नहीं चाहोगे तो धीरे धीरे आएगा ही - पिछले १० साल से हेल्थ मिशन चला रहे हैं - अरे भाई ! कब तक मिशन चलाओगे, पूरा स्वास्थय तंत्र खड़ा करो, उसको काम करने पर मज़बूर करो। समय है नहीं हाथ में, और ये मिशन ही चला रहे हैं - अभी समय है - विश्व अर्थव्यवस्था में से जितना पैसा बनाना है बना लो - लोगो का जीवन स्तर ऊपर उठा लो, नहीं तो फिर हालत ग्रीस, इंग्लैंड जैसी हो जाएगी - मैन्युफैक्चरिंग के नाम पर टॉयलेट पेपर की इंडस्ट्री, जॉब्स का पता नहीं, करोड़ों को सरकारी पैसे की खैरात बांटनी पड़ेगी - और तो और हमारे पास तो ऑक्सफ़ोर्ड और कैंब्रिज जैसी यूनिवर्सिटीज भी नहीं है - कि विदेशी स्टूडेंट भी पढ़ने आएंगे और हम उनसे तीन गुना फीस वसूल कर लेंगे, नेशनल इन्शुरन्स जैसा अभेद्य टैक्स कलेक्शन सिस्टम भी तो अभी नहीं बना पाएं है - कैसे चलेगा देश तब? सड़क और बिजली उपलब्ध कराने में तो अभी भी नानी याद आती है। नार्थ-ईस्ट में अभी तक भारतीयता की भावना नहीं भर पाये - आदिवासी इलांकों को देश की मुख्य धारा में नहीं ला पाये - और चाहते हैं कि देश आगे बढ़े - देशवासियों को कम से कम देश का नाम तो मालूम होना चाहिए - पिछले साठ सालों से योजनाएं ही चला रहे हैं - योजनाओं के अलावा कुछ सिस्टम स्थापित जो किये हैं उनको भी चला लो - नौकरशाही नौकर की तरह नहीं मालिक की तरह आम जनता से व्यवहार करती है - भाई, साठ साल में तुमने तो यही किया है बार बार - अब मौका कुछ और लोगों को भी दो। ओबामा की तरह अगर मोदी सपना बेचता है तो मैं मोदी तो वोट दूंगा - तुम्हारे जैसे सीरियल झूठे (और मक्कार) को नहीं। केजरीवाल अभी और सीखे, केजरीवाल का नंबर पांच साल बाद। दिल्ली में शासन चलाने का बढ़िया मौका मिला था पर भाग खड़े हुए - अब कहीं और किसी राज्य में मौका ढूंढो और कुछ कर के दिखाओ - तब कुछ बात बनेगी नहीं, तो बस जनता को सब कुछ फ्री देना, लोलीपोप दिखाकर वोट लेना ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगा। फिलहाल प्रधानमंत्री के लिए मेरी पसंद मोदी - कम से कम चीजों की समझ तो हैं चाहे कृषि हो या व्यापार या फिर राष्टीर्य सुरक्षा और विदेश नीति और सबसे बड़ी बात पूरे देश का बात करता है, सबको साथ लेकर चलने की बात करता है, किसी एक समुदाय, राज्य, भाषा की नहीं। मेरी बात को अच्छे से समझना है तो इन तीनो के इंटरव्यू सुन लो, बस।

Random thoughts


घर में कुत्ते बिल्ली पाल लेंगे, पर माँ बाप को रखना दूभर है। क्यों? क्योंकि माँ बाप प्राइवेसी में दखल देते है और उन्हें 'संभाले' कौन? कुत्तों की कम सेवा नहीं करनी पड़ती - अलग से भोजन बना के दो, "पू" और "पी" करे तो सम्भालों; नहलाओं, धुलाओ; जाड़ा लगे, तो इंतजाम करो; बीमार हो जाये तो डॉक्टर को दिखाओ; यह भी देखो कि कही दूसरे को काट न ले - पश्चिम के समाज में भी परिवार से सम्बंधित बहुत अच्छी चीजे हैं (जैसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्राइवेसी का ख्याल रखना - और ये हमें सीखना है, भारतीय परिवारों में दबंगई बहुत है) पर मुझे उनके समाज की यह चीज (माँ बाप को अकेला छोड़ देना) मुझे बिलकुल पसंद नहीं। हम भी वही ट्रेंड अपनाते जा रहे हैं - माँ बाप को सरकारी पेंशन के सहारे छोड़ रहे हैं या उनको उनकी जवानी की बचत के सहारे छोड़ रहे हैं। अरे! जब कुत्ता बिल्ली पाल सकते हो, तो माँ बाप को रखने में कौन सी समस्या है? - नहीं कुछ तो तुम्हारे बच्चो को कुछ अच्छी बातें ही सिखा देंगे जो उन्हें उनकी जड़ों से बाँधे रखेंगी। 

Brazil Diary


ब्राज़ील में पहले पहल मुझे पोर्तुगीस तो बोलनी आती नहीं थी - कई बार सामने वाला कई मिनट तक समझने की कोशिश करता रहता कि आखिर मैं कहना क्या चाहता हूँ - मैं अंगेजी में बोलता, पोर्तुगीस के एक दो शब्दों को बोलने की कोशिश करता, इशारे करता और सामने वाला व्यक्ति अपनी ताबड़तोड़ पोर्तुगीस बोलता रहता। इंटरनेट था नहीं - गूगल ट्रांसलेट इसलिए काम भी नहीं कर सकता था - एक छोटी सी डायरी थी जिसमे मैंने कुछ पोर्तुगीस लिख रखी थी। उसी से काम चलाने की कोशिश करता था - हालाँकि उस डायरी में हर शाम जब होटल/हॉस्टल लौटता तो नए शब्द और वाक्य जोड़ने की कोशिश करता। देखते देखते बहुत सारे शब्द और वाक्य हो गए - कई बात भूल भी जाता था। जब किसी दूकान से खरीदना रहता तो हॉस्टल/होटल में ही इंटरनेट पर एक बातचीत तैयार कर लेता और उसको डायरी में नोट कर लेता था - दुकान में घुसने से पहले मेरे झोले से डायरी निकल आती थी - मैं वाक्यों को दोहरा लेता था ताकि दूकानदार गुस्सा न हो - भाई दुकानदार तुम्हारे लिए थोड़े ही बैठा है - हालाँकि मॉडर्न स्टोर्स में ये समस्या सामने नहीं आती थी। पोर्टो अलेग्रे में पहुँचते ही मैंने खाने की दूकान पर जाने की ठानी - लेकिन वही समस्या भाषा की - अंदर गया तो पता चला कि सब पोर्तुगीस में लिखा हुआ है - न ब्रांड पता चले (कोका कोला को छोड़कर) और न ये पता चले कि डिब्बे में शाकाहारी चीज बंद है या मांसाहारी - इंग्लैंड या भारत की तरह न हरा निशान बना होता है और न अंग्रेजी में कुछ लिखा होता है - सब कुछ पोर्तुगीस में। कुछ भी नहीं दिखा - फलों के सिवाय। दो आम, कुछ केले और दो पैकेट चिप्स [वो तो कहो चिप्स के पैकेट पर चिप्स बने होते है नहीं तो वो भी नहीं खरीद पाता हा हा   ] खरीद कर वापस लौट आया। लौटकर सबसे पहला काम जो किया वो था - गूगल ट्रांसलेट में शाकाहारी और मांसाहारी का पोर्तुगीस संस्करण खोजना। फिर मक्खन और ब्रेड का भी ट्रांसलेशन देखा - कुछ नहीं तो carne (meat), legumes (vegetables), manteiga (butter), pao (bread) उसी दिन से ज़बान पर रट गए। जब भी मार्किट जाता - दुकानों, सडकों, होटलों, पोस्टरों पर लिखी पोर्तुगीस पढने की कोशिश करता और कुछ शब्दों को वही पर डायरी में नोट कर लेता। समय के साथ कुछ बेसिक वाक्य और शब्द सीख गया। कुछ नहीं तो सबसे पहले यही कहता कि मुझे पोर्तुगीस नहीं आती है - क्या आपको इंग्लिश आती है (इउ नाउ फालो पोर्तुगीस, वोसे फाला इंगलेस) - कम से कम दूकानदार यह समझ जाता था कि इस बन्दे से डील कैसे करना है। फिर या तो हम इशारों में बात कर लेते थे या फिर किसी तीसरे बन्दे की टूटी-फूटी इंग्लिश का सहारा लेते थे। पोर्तुगीस के बहुत से शब्द इंडो-यूरोपियन भाषाओँ जैसे संस्कृत, अंग्रेजी और हिंदी से बहुत हद तक मेल खाते हैं उदाहरण के तौर पर एयरपोर्ट तो aeroporto लिखते हैं, edificio (बिल्डिंग) अंग्रेजी में edifice (ऊँची इमारत) से पूरी तरह से मिलता जुलता है। कुल मिलाकर नयी भाषा सीखने के लिए इस ट्रिप ने काफी उत्साहित किया है। मुझे लगता हैं कि पोर्तुगीस सीखने की कोशिश जारी रखनी चाहिए। 

Betanica Inn - Gramado, Brazil


काफी दिन पहले एक बंगाली फ़िल्म देखी थी - उस फ़िल्म को दार्जिलिंग और कुएर्सांग नामक छोटे पहाड़ी कस्बों में फिल्माया गया था - आज से पचास साठ साल पहले का दार्जिलिंग और उसके  आस पास के इलाके तब इतनी भीड़ भाड़ वाले नहीं थे - हरे भरे पहाड़ , बादल, हल्की फुहारें, शान्ति और भीड़ भाड़ से दूर --- कुछ ऐसा ही है यह क़स्बा - खास तौर यहाँ के होटल बेहद खूबसूरत हैं – कम से कम जिनमे मैं रुक रहा हूँ - इंग्लैड भी फीका है इसके सामने - मैंने जितना सोचा था उससे कहीं ज्यादा सुन्दर और शांत है - अभी शाम होने को आयी है - सूरज ढल चुका है - बस कुछ उजाला बाकी है - चिड़ियाँ चहचहा रही है और मैं होटल की पहली बालकनी में बैठकर आनंद ले रहा हूँ – चारों तरफ बस हरियाली ही नज़र आ रही है – लकड़ी की रेलिंग से नीचे देखने पर बस हरा रंग दिखाई पड़ता है – लॉन में बस हरी घास है – पेड़ों के तनों के नीचे कई जगह रंग बिरंगे फूलों से भरे छोटे छोटे गमले है – एक जगह पुरानी लकड़ी पड़ी हुई है और उसके सहारे लकड़ी की तख्ती का रंग बिरंगा बड़े साइज़ का हँसता मुस्काता हुआ “बीटल” ऐसे रखा हुआ है कि लगे वो लकड़ी पर चढ़ रहा है और उस तख्ती पर नीचे पोर्तुगीस भाषा में लिखा हुआ है ‘Bem Vindo’ – यानी ‘आपका स्वागत है’ – उसे देखते ही मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गयी - एक झाड़ में सफ़ेद और गुलाबी रंग के बेहद घने फूल खिले हुए है – पत्ते दिखाई तक नहीं पड़ते – ऐसा लगता है ये होटल अभी नया ही बना है – एक झूला भी पड़ा हुआ है – एक बेंच – सब के सब खाली – क्योंकि यहाँ पर लोग सुकून ढूँढने आते है और ज्यादातर समय रेस्तरां या घूमने में बिताते है – फिलहाल अगर अच्छी धूप हो, तो शायद लोग होटल के इस लॉन में जरुर बैठते होंगे – अब रात हो चली है – बालकनी की बत्तियां जल उठी है – बादल भी आ रहे है