जातिवादी और स्त्री-द्वेषी


अख़बारों और समाचार चैनलों के माध्यम से जब उत्तर प्रदेश के समाज का सामंतवादी, जंगली और स्त्री-द्वेषी चेहरा जब सामने आता है तो अंदर से खुद से घृणा हो जाती है, दिल और दिमाग में एक खलबली सी मचती है, हिन्दू-हिन्दू, दलित-दलित चिल्लाने वालों से सख्त नफरत हो जाती है, समझ नहीं आता ये सब कैसे सुधरे, कभी मन करता है पुलिस को दोषियों को सीधा गोली मारनी चाहिए और उनको वैसे ही पेड़ पर लटका देना चाहिए, पर ये सब तो संभव नहीं है। समस्या हर स्तर पर है - चाहे नेता हो या आईएएस अफसर सब के मन में स्त्री-द्वेष है - लगभग सब स्त्री को दोयम दर्जे का ही मानते हैं, सबके लिए वह बस एक जिस्म भर है, खाना बनाने वाली या नौकर भर है, कमजोर है। हम करे भी तो क्या करें - अपने घर में ही जब हम इन सब चीजों का विरोध नहीं कर पाते हैं तो बाहर क्या करेंगे। सबका अपना अपना सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक भाग्य है - हमे उल्टा प्रदेश में ही जन्म लेना था, स्त्री-द्वेषी जातिवादी "हिन्दू" समाज में ही बढ़ना और पलना था - वो तो कहो गनीमत है कि यूनिवर्सिटी में मित्रों (लड़के और लडकियाँ दोनों) की एक ठीक-ठाक मंडली मिल गयीं नहीं तो हम भी उत्तर प्रदेश के करोड़ों महान जातिवादी और स्त्री-द्वेषी लोगो में से एक हुआ करते।