अवधी लोक गीत/संगीत (Awadhi Folk Songs/Music)

आज सुबह जब मैं अपने काम पर जा रहा था तभी अचानक ख्याल आया कि क्यों न अवधी लोकगीत सुने जाए। आखिर अवधी तो अपनी मातृभाषा ही है। बचपन में जब माँ अवधी गीत गाती थी या फिर विवाह, मुंडन, गौना गीत जब मैं सुनता था, तो समझ नहीं आते थे - शायद गाने वाले लोगो की भाषा और मेरी अवधी की समझ में जमीन आसमान का अंतर था।  लखनऊ आकाशवाणी रेडियो से सौहर, नकटा आदि प्रसारित होते थे पर कभी इनको ध्यान से नहीं सुना - इन गीतों क्या महत्व है, मुझे नहीं मालूम था - इसलिए भी कभी इन्हे सीखने में दिल नहीं लगाया। लोकगीतों में अपनी संस्कृति की एक सम्पूर्ण झांकी मिल जाती है - पर यह सब बचपन में कहाँ मालूम था। शायद बचपन से हॉस्टल में रहा हूँ, इसलिए इन चीजों की जानकारी और भी कम है। आज हमारा दिमाग कुछ इस तरीके से प्रोग्राम कर दिया गया है कि हमें लगता है जो पुराना है, गाँव से जुड़ा है, वह सब बेकार है। जो नया है, हिंदी या अंग्रेजी जैसी भाषाएँ प्रदान कर रही है, वही स्टैण्डर्ड है, बढ़िया है। ग्रामीण अवध की नयी पीढ़ी अपनी संस्कृति और इतिहास को भूलती जा रही है। इसी वजह से हमने आज सामाजिक स्तर बहुत कुछ खो दिया है - हालाँकि दूर दराज़ के गाँव में स्थिति अभी भी कुछ हद तक ठीक ठाक है। महिलाएं और पुरुष अपने लोक गीतों को सुनते, सीखते, और गाते हैं। 

पड़ोस में एक अंग्रेज बैठकर मुझसे बातें कर रहा हैं, वहीँ दूसरी तरफ मेरे लैपटॉप पर कैलास यादव का "राम लखन जब आये महल में, देखन आई सब नारी" चल राह है। अंग्रेज स्टैण्डर्ड साउथर्न इंग्लिश में बात कर रहा है और इधर राम कैलास यादव का "सीता राम को भजो" चल रहा था - बड़ा अजीब लग रहा था - भाषाई अंतर कितना बड़ा है, उससे भी ज्यादा बड़ा अंतर संस्कृति का है  - समझ नहीं आता, अंग्रेजों ने पूरे हिन्दुस्तान पर कैसे इतने साल तक राज किया। 

जब इंग्लैंड में तीन साल गुज़ार लिए हैं अब समझ में आता हैं कि अपनी मातृभाषा और संस्कृति का क्या महत्व होता है। आप पूरे विश्व की संस्कृतियों को पढ़ें, समझे परन्तु यदि अपनी ही संस्कृति और भाषा का ज्ञान नहीं है तो आपको कोई इज्जत नहीं देगा।