ढोंग

ढोंग देखिये - पढ़े लिखे बहुत से लोग खुद को धर्म परिवर्तन कर बौद्ध ("जाग्रत व्यक्ति" या "प्रबुद्ध व्यक्ति") कहते है , अपने को भगवान बुद्ध जिन्होंने हिंसा/घृणा त्यागने का सन्देश दिया, का सबसे बड़ा भक्त समझते है, लेकिन यही लोग हिन्दू देवी देवताओं का मजाक उड़ाते हैं, हिन्दू समाज को गाली देते हैं, गीता, वेद, रामचरित इत्यादि को तरह तरह से तोड़मरोड़ कर समाज में घृणा और भ्रम फैलाते हैं, अम्बेडकर को ऊँचा बड़ा बताने के लिए गांधी, पटेल, नेहरू को गलियाते हैं। बुद्ध की नास्तिकता को आस्तिक हिन्दू दर्शन से तुलना कर आस्तिकों का मज़ाक उड़ाते हैं, पर दूसरे ही दिन आप को ये लोग बुद्ध और अम्बेडकर को भगवान मान कर उनके पैरों में दिया और अगरबत्ती जलाते हुए नज़र आते हैं, मत्था टेकते नज़र आते हैं। हिन्दुओं के बीच तो बुद्ध भगवान माने जाते हैं - पर इन झूठे बौद्धों ने हिन्दू देवी देवताओं, पुस्तकों, मिथकों इत्यादि के प्रति दलितों और पिछड़ों के बीच घृणा फैला रखी है। महात्मा बुद्ध ने क्या इसी घृणा और धूर्तता का सन्देश दिया था? बाबा साहब ने क्या इसी घृणा और धूर्तता का सन्देश दिया था?

RSS to train and appoint Dalits as priests in Hindu temples - 2006


NEW DELHI: Following up on its radical call last year to train and appoint Dalits as priests in Hindu temples, the Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) has severely condemned the barring of Dalits from a temple in Orissa recently. 

An year-end editorial in the Sangh mouthpiece Panchjanya termed as unfortunate the discriminatory attitude of temple authorities at the Jagannath temple in Kerdagarh saying it was "shameful that even in 2006 there are temples where Dalits are disallowed ... Even God will desert the temple that Dalits cannot enter." 

The sanctum sanctorum of the temple was closed in mid-December with upper caste Hindus refusing to perform puja after three groups of Dalits, armed with a High Court order, entered the premises. 

The entry of the Dalits into the temple put an end to a 250-year-old ban, but the upper caste Hindus immediately closed the temple down saying it had been "desecrated". The imbroglio was later resolved by religious leaders, but deep-rooted resentment on both sides continues to simmer. 

The editorial further states that after the intervention of several senior religious leaders, Dalits have been allowed to enter the Kerdagarh temple. However, there are two paths leading up to the area from where devotees offer prayers - one for the "so-called upper castes" and one for Dalits. This, it says, is wrong and has to be amended forthwith. "There should be one path for all Hindus." 

The RSS has castigated what it repeatedly calls the "so-called uppers castes" for their discriminatory ways saying they are in fact of the "lowest levels" for doing so. "Those who are against allowing Dalits inside temples are against the Hindu Samaj", it states emphatically. "There should be no Hindu temple which discriminates against people on the basis of caste." 

Further, it says, "those Dalits who are being provoked to change their views through such incidents have to be assured that crores of Hindus are with them. 

It has also come down strongly on leaders of the "Hindu Samaj" for allowing situations which political opportunists can exploit. "The moment this controversy happened, political vultures started fuelling it ... Upholders of the Hindu Samaj have to ensure they allow no incident to occur that can be used by political opportunists. Nor should there be occasion for such an issue going to court." --a direct comment on the fact that Dalits had to approach the High Court for an order to enter the temple. 

Orissa temples have for long been embroiled in controversies arising out of incidents of caste or communal discrimination. The Jagannath temple in Puri famously turned away the then Prime Minister Indira Gandhi for being married to a non-Hindu. She had to view the temple from a building across the road.

सोनिया गाँधी को आप कितना जानते हैं ? (भाग-१)


जब इंटरनेट और ब्लॉग की दुनिया में आया तो सोनिया गाँधी के बारे में काफ़ी कुछ पढने को मिला । पहले तो मैंने भी इस पर विश्वास नहीं किया और इसे मात्र बकवास सोच कर खारिज कर दिया, लेकिन एक-दो नहीं कई साईटों पर कई लेखकों ने सोनिया के बारे में काफ़ी कुछ लिखा है जो कि अभी तक प्रिंट मीडिया में नहीं आया है (और भारत में इंटरनेट कितने और किस प्रकार के लोग उपयोग करते हैं, यह बताने की आवश्यकता नहीं है) । यह तमाम सामग्री हिन्दी में और विशेषकर "यूनिकोड" में भी पाठकों को सुलभ होनी चाहिये, यही सोचकर मैंने "नेहरू-गाँधी राजवंश" नामक पोस्ट लिखी थी जिस पर मुझे मिलीजुली प्रतिक्रिया मिली, कुछ ने इसकी तारीफ़ की, कुछ तटस्थ बने रहे और कुछ ने व्यक्तिगत मेल भेजकर गालियाँ भी दीं (मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्नाः) । यह तो स्वाभाविक ही था, लेकिन सबसे आश्चर्यजनक बात यह रही कि कुछ विद्वानों ने मेरे लिखने को ही चुनौती दे डाली और अंग्रेजी से हिन्दी या मराठी से हिन्दी के अनुवाद को एक गैर-लेखकीय कर्म और "नॉन-क्रियेटिव" करार दिया । बहरहाल, कम से कम मैं तो अनुवाद को रचनात्मक कार्य मानता हूँ, और देश की एक प्रमुख हस्ती के बारे में लिखे हुए का हिन्दी पाठकों के लिये अनुवाद पेश करना एक कर्तव्य मानता हूँ (कम से कम मैं इतना तो ईमानदार हूँ ही, कि जहाँ से अनुवाद करूँ उसका उल्लेख, नाम उपलब्ध हो तो नाम और लिंक उपलब्ध हो तो लिंक देता हूँ) ।






पेश है "आप सोनिया गाँधी को कितना जानते हैं" की पहली कडी़, अंग्रेजी में इसके मूल लेखक हैं एस.गुरुमूर्ति और यह लेख दिनांक १७ अप्रैल २००४ को "द न्यू इंडियन एक्सप्रेस" में - अनमास्किंग सोनिया गाँधी- शीर्षक से प्रकाशित हुआ था ।
"अब भूमिका बाँधने की आवश्यकता नहीं है और समय भी नहीं है, हमें सीधे मुख्य मुद्दे पर आ जाना चाहिये । भारत की खुफ़िया एजेंसी "रॉ", जिसका गठन सन १९६८ में हुआ, ने विभिन्न देशों की गुप्तचर एजेंसियों जैसे अमेरिका की सीआईए, रूस की केजीबी, इसराईल की मोस्साद और फ़्रांस तथा जर्मनी में अपने पेशेगत संपर्क बढाये और एक नेटवर्क खडा़ किया । इन खुफ़िया एजेंसियों के अपने-अपने सूत्र थे और वे आतंकवाद, घुसपैठ और चीन के खतरे के बारे में सूचनायें आदान-प्रदान करने में सक्षम थीं । लेकिन "रॉ" ने इटली की खुफ़िया एजेंसियों से इस प्रकार का कोई सहयोग या गठजोड़ नहीं किया था, क्योंकि "रॉ" के वरिष्ठ जासूसों का मानना था कि इटालियन खुफ़िया एजेंसियाँ भरोसे के काबिल नहीं हैं और उनकी सूचनायें देने की क्षमता पर भी उन्हें संदेह था ।
सक्रिय राजनीति में राजीव गाँधी का प्रवेश हुआ १९८० में संजय की मौत के बाद । "रॉ" की नियमित "ब्रीफ़िंग" में राजीव गाँधी भी भाग लेने लगे थे ("ब्रीफ़िंग" कहते हैं उस संक्षिप्त बैठक को जिसमें रॉ या सीबीआई या पुलिस या कोई और सरकारी संस्था प्रधानमन्त्री या गृहमंत्री को अपनी रिपोर्ट देती है), जबकि राजीव गाँधी सरकार में किसी पद पर नहीं थे, तब वे सिर्फ़ काँग्रेस महासचिव थे । राजीव गाँधी चाहते थे कि अरुण नेहरू और अरुण सिंह भी रॉ की इन बैठकों में शामिल हों । रॉ के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने दबी जुबान में इस बात का विरोध किया था चूँकि राजीव गाँधी किसी अधिकृत पद पर नहीं थे, लेकिन इंदिरा गाँधी ने रॉ से उन्हें इसकी अनुमति देने को कह दिया था, फ़िर भी रॉ ने इंदिरा जी को स्पष्ट कर दिया था कि इन लोगों के नाम इस ब्रीफ़िंग के रिकॉर्ड में नहीं आएंगे । उन बैठकों के दौरान राजीव गाँधी सतत रॉ पर दबाव डालते रहते कि वे इटालियन खुफ़िया एजेंसियों से भी गठजोड़ करें, राजीव गाँधी ऐसा क्यों चाहते थे ? या क्या वे इतने अनुभवी थे कि उन्हें इटालियन एजेंसियों के महत्व का पता भी चल गया था ? ऐसा कुछ नहीं था, इसके पीछे एकमात्र कारण थी सोनिया गाँधी । राजीव गाँधी ने सोनिया से सन १९६८ में विवाह किया था, और हालांकि रॉ मानती थी कि इटली की एजेंसी से गठजोड़ सिवाय पैसे और समय की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं है, राजीव लगातार दबाव बनाये रहे । अन्ततः दस वर्षों से भी अधिक समय के पश्चात रॉ ने इटली की खुफ़िया संस्था से गठजोड़ कर लिया । क्या आप जानते हैं कि रॉ और इटली के जासूसों की पहली आधिकारिक मीटिंग की व्यवस्था किसने की ? जी हाँ, सोनिया गाँधी ने । सीधी सी बात यह है कि वह इटली के जासूसों के निरन्तर सम्पर्क में थीं । एक मासूम गृहिणी, जो राजनैतिक और प्रशासनिक मामलों से अलिप्त हो और उसके इटालियन खुफ़िया एजेन्सियों के गहरे सम्बन्ध हों यह सोचने वाली बात है, वह भी तब जबकि उन्होंने भारत की नागरिकता नहीं ली थी (वह उन्होंने बहुत बाद में ली) । प्रधानमंत्री के घर में रहते हुए, जबकि राजीव खुद सरकार में नहीं थे । हो सकता है कि रॉ इसी कारण से इटली की खुफ़िया एजेंसी से गठजोड़ करने मे कतरा रहा हो, क्योंकि ऐसे किसी भी सहयोग के बाद उन जासूसों की पहुँच सिर्फ़ रॉ तक न रहकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक हो सकती थी ।
जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था तब सुरक्षा अधिकारियों ने इंदिरा गाँधी को बुलेटप्रूफ़ कार में चलने की सलाह दी, इंदिरा गाँधी ने अम्बेसेडर कारों को बुलेटप्रूफ़ बनवाने के लिये कहा, उस वक्त भारत में बुलेटप्रूफ़ कारें नहीं बनती थीं इसलिये एक जर्मन कम्पनी को कारों को बुलेटप्रूफ़ बनाने का ठेका दिया गया । जानना चाहते हैं उस ठेके का बिचौलिया कौन था, वाल्टर विंसी, सोनिया गाँधी की बहन अनुष्का का पति ! रॉ को हमेशा यह शक था कि उसे इसमें कमीशन मिला था, लेकिन कमीशन से भी गंभीर बात यह थी कि इतना महत्वपूर्ण सुरक्षा सम्बन्धी कार्य उसके मार्फ़त दिया गया । इटली का प्रभाव सोनिया दिल्ली तक लाने में कामयाब रही थीं, जबकि इंदिरा गाँधी जीवित थीं । दो साल बाद १९८६ में ये वही वाल्टर विंसी महाशय थे जिन्हें एसपीजी को इटालियन सुरक्षा एजेंसियों द्वारा प्रशिक्षण दिये जाने का ठेका मिला, और आश्चर्य की बात यह कि इस सौदे के लिये उन्होंने नगद भुगतान की मांग की और वह सरकारी तौर पर किया भी गया । यह नगद भुगतान पहले एक रॉ अधिकारी के हाथों जिनेवा (स्विटजरलैण्ड) पहुँचाया गया लेकिन वाल्टर विंसी ने जिनेवा में पैसा लेने से मना कर दिया और रॉ के अधिकारी से कहा कि वह ये पैसा मिलान (इटली) में चाहता है, विंसी ने उस अधिकारी को कहा कि वह स्विस और इटली के कस्टम से उन्हें आराम से निकलवा देगा और यह "कैश" चेक नहीं किया जायेगा । रॉ के उस अधिकारी ने उसकी बात नहीं मानी और अंततः वह भुगतान इटली में भारतीय दूतावास के जरिये किया गया । इस नगद भुगतान के बारे में तत्कालीन कैबिनेट सचिव बी.जी.देशमुख ने अपनी हालिया किताब में उल्लेख किया है, हालांकि वह तथाकथित ट्रेनिंग घोर असफ़ल रही और सारा पैसा लगभग व्यर्थ चला गया । इटली के जो सुरक्षा अधिकारी भारतीय एसपीजी कमांडो को प्रशिक्षण देने आये थे उनका रवैया जवानों के प्रति बेहद रूखा था, एक जवान को तो उस दौरान थप्पड़ भी मारा गया । रॉ अधिकारियों ने यह बात राजीव गाँधी को बताई और कहा कि इस व्यवहार से सुरक्षा बलों के मनोबल पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है और उनकी खुद की सुरक्षा व्यवस्था भी ऐसे में खतरे में पड़ सकती है, घबराये हुए राजीव ने तत्काल वह ट्रेनिंग रुकवा दी,लेकिन वह ट्रेनिंग का ठेका लेने वाले विंसी को तब तक भुगतान किया जा चुका था ।
राजीव गाँधी की हत्या के बाद तो सोनिया गाँधी पूरी तरह से इटालियन और पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों पर भरोसा करने लगीं, खासकर उस वक्त जब राहुल और प्रियंका यूरोप घूमने जाते थे । सन १९८५ में जब राजीव सपरिवार फ़्रांस गये थे तब रॉ का एक अधिकारी जो फ़्रेंच बोलना जानता था, उनके साथ भेजा गया था, ताकि फ़्रेंच सुरक्षा अधिकारियों से तालमेल बनाया जा सके । लियोन (फ़्रांस) में उस वक्त एसपीजी अधिकारियों में हड़कम्प मच गया जब पता चला कि राहुल और प्रियंका गुम हो गये हैं । भारतीय सुरक्षा अधिकारियों को विंसी ने बताया कि चिंता की कोई बात नहीं है, दोनों बच्चे जोस वाल्डेमारो के साथ हैं जो कि सोनिया की एक और बहन नादिया के पति हैं । विंसी ने उन्हें यह भी कहा कि वे वाल्डेमारो के साथ स्पेन चले जायेंगे जहाँ स्पेनिश अधिकारी उनकी सुरक्षा संभाल लेंगे । भारतीय सुरक्षा अधिकारी यह जानकर अचंभित रह गये कि न केवल स्पेनिश बल्कि इटालियन सुरक्षा अधिकारी उनके स्पेन जाने के कार्यक्रम के बारे में जानते थे । जाहिर है कि एक तो सोनिया गाँधी तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के अहसानों के तले दबना नहीं चाहती थीं, और वे भारतीय सुरक्षा एजेंसियों पर विश्वास नहीं करती थीं । इसका एक और सबूत इससे भी मिलता है कि एक बार सन १९८६ में जिनेवा स्थित रॉ के अधिकारी को वहाँ के पुलिस कमिश्नर जैक कुन्जी़ ने बताया कि जिनेवा से दो वीआईपी बच्चे इटली सुरक्षित पहुँच चुके हैं, खिसियाये हुए रॉ अधिकारी को तो इस बारे में कुछ मालूम ही नहीं था । जिनेवा का पुलिस कमिश्नर उस रॉ अधिकारी का मित्र था, लेकिन यह अलग से बताने की जरूरत नहीं थी कि वे वीआईपी बच्चे कौन थे । वे कार से वाल्टर विंसी के साथ जिनेवा आये थे और स्विस पुलिस तथा इटालियन अधिकारी निरन्तर सम्पर्क में थे जबकि रॉ अधिकारी को सिरे से कोई सूचना ही नहीं थी, है ना हास्यास्पद लेकिन चिंताजनक... उस स्विस पुलिस कमिश्नर ने ताना मारते हुए कहा कि "तुम्हारे प्रधानमंत्री की पत्नी तुम पर विश्वास नहीं करती और उनके बच्चों की सुरक्षा के लिये इटालियन एजेंसी से सहयोग करती है" । बुरी तरह से अपमानित रॉ के अधिकारी ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से इसकी शिकायत की, लेकिन कुछ नहीं हुआ । अंतरराष्ट्रीय खुफ़िया एजेंसियों के गुट में तेजी से यह बात फ़ैल गई थी कि सोनिया गाँधी भारतीय अधिकारियों, भारतीय सुरक्षा और भारतीय दूतावासों पर बिलकुल भरोसा नहीं करती हैं, और यह निश्चित ही भारत की छवि खराब करने वाली बात थी । राजीव की हत्या के बाद तो उनके विदेश प्रवास के बारे में विदेशी सुरक्षा एजेंसियाँ, एसपीजी से अधिक सूचनायें पा जाती थी और भारतीय पुलिस और रॉ उनका मुँह देखते रहते थे । (ओट्टावियो क्वात्रोची के बार-बार मक्खन की तरह हाथ से फ़िसल जाने का कारण समझ में आया ?) उनके निजी सचिव विंसेंट जॉर्ज सीधे पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों के सम्पर्क में रहते थे, रॉ अधिकारियों ने इसकी शिकायत नरसिम्हा राव से की थी, लेकिन जैसी की उनकी आदत (?) थी वे मौन साध कर बैठ गये ।
संक्षेप में तात्पर्य यह कि, जब एक गृहिणी होते हुए भी वे गंभीर सुरक्षा मामलों में अपने परिवार वालों को ठेका दिलवा सकती हैं, राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी के जीवित रहते रॉ को इटालियन जासूसों से सहयोग करने को कह सकती हैं, सत्ता में ना रहते हुए भी भारतीय सुरक्षा अधिकारियों पर अविश्वास दिखा सकती हैं, तो अब जबकि सारी सत्ता और ताकत उनके हाथों मे है, वे क्या-क्या कर सकती हैं, बल्कि क्या नहीं कर सकती । हालांकि "मैं भारत की बहू हूँ" और "मेरे खून की अंतिम बूँद भी भारत के काम आयेगी" आदि वे यदा-कदा बोलती रहती हैं, लेकिन यह असली सोनिया नहीं है । समूचा पश्चिमी जगत, जो कि जरूरी नहीं कि भारत का मित्र ही हो, उनके बारे में सब कुछ जानता है, लेकिन हम भारतीय लोग सोनिया के बारे में कितना जानते हैं ? (भारत भूमि पर जन्म लेने वाला व्यक्ति चाहे कितने ही वर्ष विदेश में रह ले, स्थाई तौर पर बस जाये लेकिन उसका दिल हमेशा भारत के लिये धड़कता है, और इटली में जन्म लेने वाले व्यक्ति का....)
(यदि आपको यह अनुवाद पसन्द आया हो तो कृपया अपने मित्रों को भी इस पोस्ट की लिंक प्रेषित करें, ताकि जनता को जागरूक बनाने का यह प्रयास जारी रहे)... समय मिलते ही इसकी अगली कडी़ शीघ्र ही पेश की जायेगी.... आमीन
नोट : सिर्फ़ कोष्ठक में लिखे दो-चार वाक्य मेरे हैं, बाकी का लेख अनुवाद मात्र है ।
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If this is what secularism means,give me Hindutva


By Tavleen Singh 

The Dar-ul-Uloom’s fatwa last week condemning Imrana to a marital life of unmitigated hell and absolving her rapist father-in-law comes as no surprise to me. It comes as no surprise because last year I had the dubious pleasure of visiting the Dar-ul-Uloom in Deoband and seeing for myself what this Islamic school that inspired the Taliban is really like. 




It was this inspiration that caused the Taliban to execute women in Kabul’s infamous football field for crimes they often did not know they had committed. It was this inspiration from Deoband’s interpretation of the shariyat that caused the Taliban to ban education for women and to punish them for such supposed misdemeanors as wearing white socks and shoes that made a noise when they walked. 


Now, Deoband rules that Imrana, a mother of five children, of Charthawal village, district Muzaffarnagar, in UP is haraam for her husband, Noor Ilahi because she dared protest publicly about being raped by her father-in-law, Ali Mohammad. 


It is typical of the Deobandi interpretation of the laws of Islam that they have not condemned the rapist. And, if you were following the story you would have noticed that the bearded maulvis who expounded on the subject on television hinted that they did not believe she could have been raped. “Taali donon haathon sey bajti hai,” said one bearded monster with a smug smile on his face. 


As a Muslim woman Imrana showed extraordinary courage in going public at all because under Islamic law rape can only be punished if four male witnesses exist. They never do. Her only hope now is that the normal laws of the land are implemented and her father-in-law charged and punished under them. Her personal life is ruined because her wimp of a husband has already announced that he will obey the fatwa from Deoband. 


There are wider implications of Imrana’s story and they should concern us all. What should concern us is that the Dar-ul-uloom will get away with its outrageous interference in the law. What should concern us even more is that the Dar-ul-uloom should exist at all on the soil of India. If you are shocked that I can say something so politically incorrect let me describe for you what this institution of Islamic teaching looks like. 


During the general election in May last year I happened to drive past Deoband on my way to cover election stories in UP and since I had heard of how the Taliban took their inspiration from the Dar-ul-Uloom decided that it would be worth my while to stop and take a look at this influential school. 


Deoband is a shabby, little hick town with a dusty, disorderly collection of half-built shops as its main bazaar and its shabbiness makes the magnificence of the Dar-ul-Uloom even more startling. But, I go too fast. I drove through the dusty bazaar, along a gutted road to arrive at a pair of tall, black wrought iron gates. Beyond these gates I could see several fine, white-washed Islamic buildings and beyond them a magnificent mosque that seemed almost bigger than the town of Deoband. At the entrance was a white-bearded gentleman in traditional Islamic clothing — a long kurta over loose pajamas that barely reached his calves. I asked him if I could meet the chief Maulana and after several minutes on the telephone to someone to whom he conveyed my request he said I could not meet him because a) I did not have an appointment and b) I was not veiled. 


This irritated me and I pointed out that this was India and not Saudi Arabia and in any case I was not Muslim and that if the Maulana was so keen on purdah then perhaps he should be in it. 


At this point a group of bearded students walked by and asked what was going on. When I explained they said I should go to the main office and make an appointment to come back another time. Knowing that I would never have any desire to come back to the Dar-ul-Uloom I decided that as I was there I could at least look around the famed seminary. 


So, despite the protests of the white bearded watchman I strolled onto the grounds and found myself in a little bit of Saudi Arabia. All the men I saw were bearded and in Islamic clothes, a small bazaar on the campus sold books only in Urdu and Arabic and when I stopped to talk to a group of young men they said (in Urdu) that they could not talk to me because they spoke only Arabic and I had been rude about their Maulana. I never found out what they considered rude but thought them not just rude but nauseatingly fanatical. 


The whole atmosphere was medieval and extremely unpleasant especially if you happened to be a woman. In the forty minutes or so that I spent in the Dar-ul-Uloom I saw only one other woman and she was so heavily veiled that only her eyes and a bit of her nose were exposed. So you see why the fatwa that punishes the victim and not the rapist comes as no surprise to me. 


Finally, two questions. Why is a seminary that can only breed Islamic fanatics allowed to exist in India? Will the government of India take action against the maulvis who issued that fatwa declaring Imrana haraam for her husband? Both questions demand answers from ‘secular’ leaders like Sonia Gandhi and Mulayam Singh Yadav. And, if this is the secular India they want to build then give me Hindutva any old time.



http://archive.deccanherald.com/Deccanherald/jul22005/panorama164941200571.asp

SIR JOHN HERSCHEL ON HINDU MATHEMATICS.



[The following extract from Herschel's article "Mathematics" in David Brewster's Edinburgh Encyclopaedia (Philadelphia, 1832) is reprinted because it contains facts little known and arguments too good to be ignored. At the time when the article appeared, Colebrooke's great translation of the standard Hindu works of Algebra was still fresh in the public mind. (London, 1817.)  Albert J. Edmunds.]

So early as the latter part of the tenth century (A. D. 980) Gerbert, having learned of the Moors in Spain their system of arithmetic, had imparted it to his countrymen the French, whence it rapidly spread over Europe, and continues in use to the present moment. The Moors and Arabs, by their own unanimous avowal, derived this admirable invention from the Hindus who, there is good reason to believe, were in possession of it at least from the time of Pythagoras. The story of this philosopher's visit to the Brahmins is well known, and a suspicion may be entertained that his time there was better employed than in picking up the ridiculous doctrine of the transmigration of souls. Boetius relates the singular fact of a system of arithmetical characters and numeration employed among the pythagoreans, which he transcribes, and which bears a striking resemblance, almost amounting to identity, with those now in use, whose origin we know to be Hindu. The discovery (generally so considered) of the property of the right-angled triangle by the same philosopher, is a remarkable coincidence. This was known ten centuries before to the Chinese, if we may credit the respectable testimony of Gaubil. It was well known to the earliest Hindu writers of whom we have any knowledge, and who appear to have derived it from a source of much more remote antiquity. It is scarce conceivable that a Greek invention, of such extreme convenience as the decimal arithmetic, should have been treated with such neglect, remaining confined to the knowledge of a few speculative men, till, from being communicated as a mystery, it was at last preserved but as a curiosity ; but the aversion of that people to foreign habits will easily account for this, on the supposition of its Hindu origin.

An abstract truth, however, is of no country, and would be received with rapture, from whatever quarter, by men already advanced enough to appreciate its value. We are then strongly inclined to conclude that in the latter as well as in the former instance Pythagoras may have acted only the part of a faithful reporter of foreign knowledge, though the reverse hypothesis, viz., that the first impulse was given to Hindu science at this period by the Greek philosopher, might certainly be maintained.

However this may be, the great question as to the origin of algebra, which has been the cause of so much speculation, seems at length, by the enlightened researches which have of late been made in Hindu literature, nearly decided in favor of that nation. It will be proper to state, as briefly as is consistent with perspicuity, the grounds of this conclusion. The earliest Hindu writer on algebra, of whom any certain or even traditional knowledge has reached us, is the astronomer Aryabhatta who, from various circumstances, is concluded to have written so early as the fifth century.

It is true, the work of Diophantus takes the precedence of this in point of antiquity by about a hundred years, nor is it at all intended to deprive the Greek author of the merit of independent invention. Indeed the comparison of the state of knowledge in the two countries at the periods we speak of, is decidedly favorable to the independence of their views. By what we know of the Hindu author it appears that he was in possession of a general artifice of a very refined description (called in Sanskrit the kattaka, or "pulveriser") for the resolution of all indeterminate problems of the first degree,
and also of the method of resolving equations with several unknown quantities. It is very unlikely that these methods should have arisen at once or been the work of one man, especially as they are delivered incidentally in a work on astronomy., Now, of the latter of them we are not sure that Diophantus had any knowledge, as, although he resolves questions with more than one condition, he
always contrives, by some ingenious substitution, to avoid this difficulty. Of the former he was certainly ignorant. His arithmetic, indeed, though full of ingenious artifices for treating particular
problems, yet lays down no general methods whatever, and indicates a state of knowledge so far inferior to that of the Hindu writer that no supposed communication with India about the third or
fourth century would at all account for the phenomena. But there is yet stronger evidence. The Brahma-siddhanta, the work of Brahmagupta, a Hindu astronomer at the beginning of the seventh
century, contains a general method for the resolution of indeterminate problems of the second degree: an investigation which actually baffled the skill of every modern analyst till the time of La Grange's solution, not excepting the all-inventive Euler himself. This is a matter of a deeper dye.

The Greeks cannot for a moment be thought of as the authors of this capital discovery ; and centuries of patient thought and many successive efforts of invention must have prepared the way to it in the country where it did originate. It marks the maturity and vigor of mathematical knowledge, while the very work of Brahmagupta, in which it is delivered, contains internal evidence that in his time geometry at least was on the decline. For example, he mentions several properties of quadrilaterals as general which are only true of quadrilaterals inscribed in a circle. The discoverer of these properties (which are of considerable difficulty) could not have been ignorant of this limitation, which enters as an essential element in their demonstration. Brahmagupta, then, in this instance retailed, without fully comprehending, the knowledge of his predecessors. When the stationary character of Hindu intellect is taken into the account, we shall see reason to conclude that all we now possess of Hindu science is but part of a system, perhaps of much greater extent, which existed at a very remote period, even antecedent to the earliest dawn of science among the Greeks, and might authorize as well the visits of sages as the curiosity of conquerors.