How to master English langauage (for Hindi speakers)?

हिंदी माध्यम से पढ़े बच्चों की समस्या ये होती है कि उन्हें जिंदगी में कभी न कभी अंग्रेजी से दो चार होना ही पड़ता है चाहे उच्च शिक्षा में हो या कार्यस्थल पर - ऐसे बहुत से लोग मुझे मेसेज भेजते हैं और पूछते हैं कि अंग्रेजी कैसे सीखे - अब क्योंकि मैंने खुद बीए तक हिंदी माध्यम से पढाई की थी, मुझे मालूम है कि हिंदी माध्यम वालों को उच्च शिक्षा में, खासतौर पर शोध छात्रों कोे, सिर्फ अंग्रेजी पर पकड़ न होने के कारण किन किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है - ऐसे लोगों को मैं अपने अनुभवों के आधार पर सलाह देता हूँ - कि भई, प्रतिदिन अंग्रेजी में पढो, लिखो, सुनो और बोलो - शुरुआत में भले ही पांच मिनट ही करो, लेकिन जो करो रोजाना करो - और साथ ही अपनी प्रगति को प्रतिदिन किसी डायरी, नोटबुक, विडियो इत्यादि के जरिये नोट करते रहो ताकि ये पता चलता रहे कि आप कहाँ से कहाँ पहुचे हैं - मेहनत का कुछ असर पड़ा है या नहीं - वो सब जो आपको एक भाषा सीखने के लिए चाहिए, आजकल तो आपके फ़ोन में ही मुफ्त में उपलब्ध है - रेडियो, गाने, मूवीज, उपन्यास, कहानियों की किताबें, अखबार, विडियो रिकॉर्डर, एमएस वर्ड, वाइस रिकॉर्डर, ब्रिटिश कौंसिल से लेकर बीबीसी तक के अंग्रेजी सिखाने वाले एप्प और वेबसाइट - कहीं लाइब्रेरी, कोचिंग, यूनिवर्सिटी जाने की जरुरत नहीं है - लेकिन अक्सर मैंने देखा है कि उन्हें ये सारी सलाहें पसंद नहीं आती हैं क्योंकि वे त्वरित समाधान की खोज में निकले हुए होते हैं - वो चाहते है कि मैं कोई ऐसा फार्मूला दूँ कि एक ही सप्ताह में अंग्रेजी भाषा पर उनकी पकड़ शशि थरूर जैसी हो जाए - अब ऐसा कोई फार्मूला तो है नहीं - भाषा पर पकड़ बनाने में समय और निरंतर प्रयास की जरुरत होती है - सीखना है, पकड़ बनानी है, तो आपको प्रयास हर दिन करना होगा, हर क्षण करना होगा और लम्बे समय तक करना होगा

Noida slums and illegal Bangladeshis

नोएडा में झुग्गी झोपड़ी उजड़ने के बाद मुल्ले कह रहे हैं कि सरकार को नोटिस देने चाहिए था। क्यों भई, क्यों दे सरकार नोटिस? क्या तुमने दिया था सरकार को नोटिस, झुग्गी बनाने से पहले? नही न। सुना है ये मुल्ले उसी झुग्गी में एक मस्जिद भी खड़ी कर रहे थे। सोचो अगर मस्जिद तैयार हो जाती तो झुग्गी साफ करना कितना मुश्किल होता। उत्तर प्रदेश सरकार समय रहते बांग्लादेशी झुग्गी का सफाया करने के लिए बधाई की पात्र है। मैं तो चाहूंगा सरकार अन्य शहरों में भी यही अभियान चलाये और बांग्लादेशियों का सफाया करे।

Your pick?

Your pick? 😊
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Islam: Allah is above all, he sits on a bench in the sky
Christianity: God is above all, he lives in the sky
Hinduism: Ishwar is within and everywhere.... ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । 
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Islam: Follow Islam and only then you will reach heaven, else you will be burnt in the fire of hell.
Christianity: Believe in the Christ and only then you will reach heaven, else you will be punished for eternity in hell.
Hinduism: Follow the path of Dharma (Righteousness) with love, and you will realize the absolute truth, that is beyond the petty concepts of heaven and hell.
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Islam: Non-Muslims are Kaafirs.
Christianity: Non-Christians are heathens.
Hinduism: Everyone is one, everyone is your own... The world is one big family, all are your people!
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Islam: There is no God but Allah. Mohammad is the messenger of Allah.
Christianity: Jesus was the only son of God.
Hinduism: Ishwar keeps manifesting himself. Whenever there is rise of evil and whenever there is decline of humanity, Ishwar manifests himself. To protect the righteous and to destroy the evil, Ishwar manifests, from one age to another ....
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृज्याहम ।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
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Islam: There is only one God : Allah .
Christianity: There is only one God: Yahweh
Hinduism: Ishwar is neither one nor many, He just is and his manifestations are infinite….
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Islam: Quran is the only book of truth.
Christianity: Bible is the only book of truth.
Hinduism: Truth is one, but the Rishis interpret in many ways…
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Islam: Mankind has lost its goal.
Christianity: Every human is a born sinner.
Hinduism: Every Atman (~soul) is divine…
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Islam: There is one life, one world, one Allah and only one moment of salvation.
Christianity: There is only one life, one world, one chance of salvation.
Hinduism: Life is infinite, universe is infinite, you have infinite chances to reach the absolute truth….

Hindu places captured by converted Muslims

नाम है अनंतनाग (हिन्दुस्तानी कश्मीर) - हिन्दू कितने, 1% भी नहीं
नाम है शारदा पीठ (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर) - हिन्दू कितने, ०%
नाम है श्रीनगर ( हिन्दुस्तानी कश्मीर) - हिन्दू कितने, २%
नाम है कन्याकुमारी (तमिलनाडु) - हिन्दू कितने, <५०%
सोचो, ये सारे भूभाग कभी हिन्दू बहुल हुआ करते थे - आज ये अब्राह्मिक अनुयायियों के कब्जे में हैं - इन जगहों पर न तुम अपने त्यौहार मना सकते हो, न ही वहाँ स्थापित मंदिरों में जाकर पूजा कर सकते हो, शारदा पीठ पाकिस्तान में तुम कदम भी नहीं रख सकते हों, पूजा करने की तो बात ही छोड़ दो. ये जो मंदिर नीचे फोटो में देख रहे हो - मार्तंड सूर्य मंदिर नाम है इसका - अनंतनाग, कश्मीर में है - सिकंदर बुतशिकन (यानि मूर्तियाँ तोड़ने वाला) ने इसे और ऐसे हो सैकड़ों मंदिरों को तोडा था - फारसी इतिहासकार फ़रिश्ता कहता है कि कश्मीर में हिन्दुओं के मंदिरों को ध्वस्त करने, जलाने और विकृत करने का उपक्रम लगभग एक साल तक लगातार चला था - सेक्युलर इतिहास जो हमें स्कूलों, कालेजो में पढाया जाता है उसमें से ये सब गायब है



Martand Hindu Sun Temple, Anantnag, Kashmir

Kashmir, Kashmiriyat, and Rajnath Singh

लोग राजनाथ सिंह पर भड़के हुए हैं कि वो भड़काऊ बयान क्यों नही दे रहे हैं। केवल निंदा ही क्यों किये जा रहे हैं। तो ऐसा है यदि आप उनकी जगह होते तो आप भी यही करते। देश में शांति और सौहार्द्र बनाए रखने की जिम्मेवारी उनके कंधो पर है। वो कोई भी ऐसा बयान नही देना चाहते जिससे मीडिया मुल्लों को और भड़काए और कश्मीर की आग देश अंदरूनी हिस्सो में भड़के। और रही बात आतंकवादियों के खिलाफ़ कार्यवाही की, तो उन्हें मालूम है कि उन्हें क्या और कैसे करना है। अपनी हर स्ट्रेटेजी को मीडिया के जरिये आप तक नही न पहुचायेंगे। फेसबुक और ट्विटर पर कीबोर्ड योद्धाओं के लिए ये कहना तो आसान है कि आतंकवादियों को मार दो फांसी चढ़ा दो, पर क्या ये काम इतना आसान है। मान लो अगर गृहमंत्री बोल भी दे मीडिया में कि हम आतंकवादियों को निस्तेनाबूत कर देंगे, कश्मीरियों को सबक सिखा देंगे, तो क्या ऐसा कहने से कुछ बदल जायेगा, इस्लामिक आतंकवादी डर जायेंगे। फेसबुक और ट्विटर पर हम अपने घर की सुरक्षा में बैठकर कुछ भी बकवास कर सकते हैं। कभी कभी मैं भी करता हूँ। गुस्सा आता है तो मैं भी अनाप शनाप लिखता हूँ। पर हम आप जो सोचते हैं खासतौर कश्मीर के बारे में, उसको कार्यान्वित कर पाना इतना आसान नही है, इसके लिए चाचा नेहरू को धन्यवाद करना चाहिए। राजनाथ सिंह को मालूम है कि उन्हें एक गृहमंत्री के तौर पर किस प्रकार की संयमित भाषा इस्तेमाल करनी चाहिए। बड़े बोल बहुत सी बातों को बिगाड़ देते हैं। इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ काम जमीन पर दिखना चाहिए, ट्विटर और फेसबुक पर नही। ठीक वैसे ही जैसे मिशनरीज़ का काम जमीन पर दिखता है फेसबुक ट्विटर पर नही। गृहमंत्री का काम लोगों को भड़काना नही है, शांति और सौहार्द्र बनाये रखना है। सेना अपना काम करेगी। बड़े बोल बोलकर कर कुछ हासिल नही होता है।

Tired of hypocrisy

एक समय था जब फेमिनिज्म, सेकुलरिज्म, ह्यूमन राइट्स, मर्क्सिस्म मेरे पसंदीदा टॉपिक हुआ करते थे - लेकिन आज ये शब्द सुनते या देखते ही एक अजीब सी घृणा होती है

Islamists in Indian subcontinent

कश्मीरी पंडितों को सेकुलरिज्म के कीड़े ने काटा हुआ था - मुल्लों ने उन्हें कश्मीर से मार भगाया - कश्मीर पर कब्जा कर लिया। केरल में भी हिंदुओं को सेकुलरिज्म के कीड़े ने जबरदस्त काटा हुआ है - मुश्किल से 50-55% बचे हैं। बंगालियों को तो सेकुलरिज्म के कीड़े ने बहुत पहले ही काट लिया था - परिणाम देखिये - मुल्लों ने पहले बांग्लादेश लिया - अब बचा खुचा बंगाल भी छीन रहे हैं। 712 के बाद से अब तक 1300 साल से ज्यादा हो चुके हैं पर हिंदुओं को ये समझ नहीं आया कि अब्राहमिक रिलिजन विस्तारवादी है, उनको अपने रिलिजन के विस्तार के लिए तुम्हारी गर्दन भी काटनी पड़ेगी तो वो काटेंगे। दारुल हर्ब को दारुल इस्लाम बनाना उनका लक्ष्य है। ईसाईयत फैलाना उनका कर्तव्य है - चाहे फिर उन्हें फेक मिरकल्स करने पड़े या फिर चावल और दवाइयों की टोकरी देकर तुम्हारा नाम मैकू से माइकल करना पड़े या फिर झूठ बोलना पड़े। उन्हें मानवता से कोई लेना देना नही है - जीसस और अल्लाह जैसे इमेजिनरी कैरेक्टर्स के नाम लेकर, मानवता का नाम लेकर वो तुम्हे बेवकूफ बनाते है और तुम बनते हो - पहले हमले के 1305 साल बाद भी हिंदुओं (सिखों, जैनियों, बौद्धों) को अक्ल नहीं आयी है। पहले अफ़ग़ानिस्तान खोया, फिर सिंध खोया, पंजाब खोया, बलोचिस्तान खोया, बंगाल खोया। हैदराबाद, जूनागढ़, कश्मीर भी मुल्लों के हांथों में जाने वाला था पर पटेल ने बचा लिया। कश्मीर फिर भी हाँथ से फिसल गया, मुल्लों ने कब्जा कर लिया, कश्मीरी पंडितों को मार भगाया, उनकी औरतों को बलात्कार किया, घरों को जला दिया, जमीने हड़प ली, दुकाने लूट ली। फिर भी कश्मीरी पंडितों में खास तौर पढ़े लिखे लोगों में सेकुलरिज्म के कीड़े ने अभी तक जबरदस्त पैठ बना रखी है। आज भी टीवी पर अखबार में कश्मीरी मुल्लों के गुणगान करते नज़र आते हैं। बंगालियों का भी यही हाल है - बहुत से बंगाली अभी भी सेकुलरिज्म के नशे में हैं - मुल्लों का बचाव किये जा रहे हैं - चार दिन बाद इन्हें भी कश्मीरी पंडितों की तरह मार कर जब मुल्ले वहां से भगाएंगे, हो सकता है तब नशा उतरे। हो सकता है तब भी न उतरे, क्योंकि सेकुलरिज्म का कीड़ा हिंदुओं में जिसे एक बार काट लेता फिर वो जिंदगी भर उससे पीड़ित रहता है।

Islam and Christianity in India

हिन्दुओं को समझ में क्यूँ नहीं आता कि इस्लाम और क्रिश्चियनिटी बहुदेववाद और मूर्तिपूजा, जो कि हिन्दू धर्म के मूल तत्वों में से हैं, के खिलाफ है - इस्लाम और ईसाईयत की स्थापना हुई ही बहुदेववाद और मूर्तिपूजा को धरती से पूर्णतः मिटाने के लिए थी - इस्लाम इस समस्त धरती को दारुल-इस्लाम (इस्लाम का घर/क्षेत्र) बनाना चाहता है - उसके लिए ऐसे क्षेत्र जहाँ इस्लाम नहीं पहुंचा है वो दारुल-हर्ब (मूर्तिपूजको या बुतपरस्तों का घर/क्षेत्र) हैं जिनमें इस्लाम के प्रसार का युध्ह चल रहा है - जो लोग बहुदेववाद और मूर्तिपूजा में विश्वास करते हैं उन्हें इस्लाम और ईसाईयत में दंड का प्रावधान है - इस्लाम और ईसाईयत की पवित्र किताबें ऐसे लोगों पर विश्वास न करने को कहती हैं - ये भी उल्लेख है कि बहुदेववाद और मूर्तिपूजा में विश्वास करने वाले यानी काफ़िर (हिन्दू, बुद्धिस्ट, जैन, सिख इत्यादि) नरक में जलेंगे - मुल्लों और ईसाईयों में आप आपके मंदिर, ईश्वर, मूर्तिपूजा, रहन सहन के प्रति जो घृणा देखते हैं उसके पीछे कारण है - ये घृणा ऐसे ही नहीं उत्पन्न होती - इस घृणा का स्रोत उनकी धार्मिक किताबें हैं - उनका रिलिजन जन्मा ही बहुदेववाद और मूर्तिपूजा की घृणा से था - अगर वो आज आपके घरों पर पत्थर फेंक रहे हैं या सड़क पर सो रहे लोगों पर गाड़ी चढ़ा दे रहे हैं या आपकी माँ बहनों का बलात्कार कर रहे हैं या बंदूके उठाकर लोगों को सीने सरे आम छलनी कर रहे हैं या आत्मघाती हमले कर रहे हैं या हिन्दुओं के मंदिरों और मूर्तिओं को छिन भिन्न कर रहे हैं या आपके मूर्तिपूजक होने पर सवाल कर रहे हैं उसका मजाक उड़ा रहे हैं तो आपको मालूम होना चाहिए कि इन सब के पीछे मुल्ले हैं और मुल्ले कुरान और हदीस का अक्षरशः पालन करते हैं - आँखें खोलो, नहीं तो जैसे मुल्लों ने सिखों और हिन्दुओं को लाहौर से मार भगाया था, उनकी औरतों बहनों माँओं की इज्जत लूट कर मौत के घाट उतार दिया था या जैसे कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम किया था या जैसे बांग्लादेश में १९७१ में हिन्दुओं का बलात्कार क़त्ल किया था वैसे ही आपके या आपके बच्चों का बलात्कार या क़त्ल होगा - इस्लाम और ईसाईयत को जितना हो सके दबाकर रखो, हिन्दुओं, सिखों, जैनियों, बुद्धिस्टों इसी में तुम्हारी और तुम्हारी एकमात्र भूमि भारत की भलाई है - भारत के तीन टुकडे पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश दारुल इस्लाम यानी इस्लामिक राष्ट्र बन चुके हैं - वहाँ तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है - अपनी भलाई चाहते हो तो आँखें खोलो - ईसाईयत और इस्लाम के बारे में पढो, जानो, और सुरक्षित रहो - १४०० साल की गुलामी करने के बाद भी क्यूँ सोये पड़े हो - क्यूँ जातियों में बंटे पड़े हो - उठो जागो नहीं तो भारत के नाम पर जो छोटा सा टुकड़ा है वो भी मुल्लों और ईसाईयों के हांथो में चला जायेगा
डिस्क्लेमर: मैं अनीश्वरवादी हूँ

Islamism in Indian villages

बिना मूँछ की दाढ़ी वाले कट्टरपंथी मुल्लों ने हमारे शहरों गावों हर जगह अपना जाल बिछा लिया है। हर एक गाँव में जहां मुसलमानों की आबादी थोड़ी बहुत भी है मस्जिदें उग आयीं हैं, मदरसे उग आए हैं, पांच समय की नमाज़ बाकायदा लाउडस्पीकर पर हो रही है। मस्जिदों के मुल्ले बड़ों के दिमाग में और मदरसों के आलिम बच्चों के दिमाग में कचरा भर रहे हैं। वे मुसलमानों के दिमाग में, उन लोगों के खिलाफ जिनके साथ वो सदियों से रह रहे हैं, जहर भर रहे हैं। ये आज नही शुरू हुआ। जब गाँव मे मुल्ले नही थे, मस्जिदे नही थी, मदरसे नही थे, लोग आपस मे प्यार से मिलते थे, रहते थे। मेरे पिताजी अक्सर हरदोई जिले के एक गाँव का उदाहरण देते हैं। उस गाँव में उन्होंने कुछ समय बिताया रहा होगा। वो बताते हैं गांव में सब कुछ बढ़िया था, लोग आपस मे मिलते जुलते थे, एक दूसरे के त्योहार मनाते थे, कोई मुसलमान बिना मूँछ वाली दाढ़ी नहीं रखता था और न ही टखनों से दो इंच छोटा पजामा पहनता था। लोग मज़ार, मंदिर सबको एक जैसा मानते थे। फिर एक दिन गाँव में पता नहीं कहाँ से एक मुल्ला आया, टखने से दो इंच छोटा, सफेद पजामा पहनने वाला, बिना मूँछ की दाढ़ी वाला। उसने मदरसा और मस्जिद खोली। लोगों को नमस्ते और जय राम की जगह खुद हाफिज और अल्ल्लाह हाफिज कहना सिखाया। मुसलमानों में ये जहर भरना शुरू किया कि जिनके साथ तुम इतने घुल मिल कर रहते हो वो काफिर हैं, उनके साथ नही रहना चाहिए इत्यादि। धीरे धीरे गाँव मे धार्मिक उन्माद बढ़ता गया। झगड़े बढ़ने लगे। चोरी चपारी बढ़ गयी। अब लोग एक दूसरे नमस्ते भी न करते, एक सलाम वाले कुम कहता तो दूसरा जय राम। लोगों में बिना मूँछ की दाढ़ी वालों की संख्या में इज़ाफ़ा हो गया। बच्चे सरकारी स्कूल छोड़ मदरसे जाने लगे, विज्ञान गणित छोड़ अरबी की कुरान रटने लगे। एक दूसरे से मिलने की बजाय लोग मस्जिदों में मुल्ले के साथ गुज़ारने लगे। एक अच्छा खासा गाँव बर्बाद हो गया। मुल्ले ने जहर भर दिया।
आज ये प्रक्रिया बहुत तेजी से चल रही है। पड़ोस के दो गांवों में जहां मुसलमान ज्यादा थे आज से कोई 6-7 साल पहले कोई मस्जिद न थी, लेकिन आज बाकायदा 5 समय की नमाज लाउडस्पीकर पर होती है जबकि उस इलाके में एक भी मंदिर नहीं है जो रोज या हफ्ते में एक बार भी लाउडस्पीकर पर कोई धार्मिक संगीत या गीत बजाता हो। मदरसे भी उग आए हैं। जो खुदा हाफिज कहते थे, आज अल्लाह हाफ़िज़ कह रहे हैं। जिसे लोग रमजान कहते थे, आज अरबों की नकल करते हुए उसे रमादान कह रहे हैं। जो बच्चों को स्कूल भेजते थे, आज मदरसे में कुरान रटवाने भेज रहे हैं। फिर कहते हैं मुसलमान पिछड़ा है, नौकरी नही मिलती। कैसे मिलेगी नौकरी जब बच्चों को कुरान रटवाओगे, अरबी जबरदस्ती सिखाओगे, और मुल्लों के मदरसे भेजोगे। लड़कियों की क्या हालत कर के रख दी हैं इन मुल्लों ने इस पर मैं जाना नहीं चाहता। ये लेख बहुत लंबा हो जाएगा। जो महिलाएं घर से बाहर निकलती थी, बिना किसी झिझक के कहीं भी चली जाती थीं। मुल्लों, मदरसों और मस्जिदों के उग आने के बाद घरों में बंद रहती हैं, घर से निकलती भी हैं काले बोरों में। मुसलमानो की आधी आबादी गुलामी में जी रही है। मुल्लों, मदरसों और मस्जिदों के संख्या में गुणात्मक वृद्धि के साथ महिलाओं के अधिकारों में भारी कटौती हुई है। गाँव में अब हर मुसलमान औरत काले बुर्के में मिलती है। कोई नही जानता उसके भीतर किसकी बहन, माँ, या भाभी है, या फिर कहीं कोई आतंकवादी तो नही। हिंदुओं ने जहां घूंघट बहुत हद तक त्याग दिया है, मुस्लिम महिलाओं को बुर्के पहनने पर मजबूर किया जा रहा है, उनकी संख्या में भयंकर वृद्धि मालूम पड़ती है।
गाँवों में मुल्लों, मस्जिदों और मदरसों के बढ़ती पैठ हमारे समाज के लिए खतरनाक है। इसको कोई रोक भी नही सकता। ये ऐसी बाढ़ है जो आज नही तो कल आपके के गाँव या शहर में भी आएगी। और तबाही का मंजर लाएगी। मुल्लों का मकसद आम जनता को समझ नही आता - मुल्लों का अंतिम लक्ष्य है इस काफिरों की धरती को एक दिन दारुल-इस्लाम में परिवर्तित करना। यही लक्ष्य ईसाई मिशनरियों का भी है - भारत को हिन्दू रहित करना - ईसाईयत का गढ़ बनाना। और हिन्दू सो रहा है, उसे अपनी जति, उपजाति, गोत्र, उपगोत्र इत्यादि से छुटकारा ही नहीं मिल रहा।

O Kashmir! What has become of you?

O Kashmir! What has become of you? From the land of Charaka (the father of Ayurveda), Patanjali (the compiler of Yoga sutras), Bharata Muni (author of the Natyashastra), Abhinavagupta (the genius Shaiva sage) and Padmasambhava (who introduced Tantric Buddhism to Tibet) to being the land of retarded Abrahamic stone-pelters. How could we let this happen? Maybe we should look for answers in the worldly wisdom of the Panchatantra, which abounds with stories of lies, deceit, treachery and deception - everything that Kashmir stands for today. Oh, one more thing... Panchatantra is also a product of Kashmir. Hindustan se rishta kya? Om bhur bhuva swaha. ~ Ashish Dhar

Supply-side barriers to maternity care at health-sub-centres in rural India


Article can be accessed from PeerJ's official website.
There exist several barriers to maternal health service utilization in developing countries. Most of the previous studies conducted in India have focused on demand-side barriers, while only a few have touched upon supply-side barriers. None of the previous studies in India have investigated the factors that affect maternal health care utilization at health sub-centers (HSCs) in India, despite the fact that these institutions, which are the geographically closest available public health care facilities in rural areas, play a significant role in providing affordable maternal health care. Therefore, this study aims to examine the supply-side determinants of maternal service utilization at HSCs in rural India.

Data and Methods

This study uses health facility data from the nationally representative District-Level Household Survey, which was administered in 2007–2008 to examine the effect of supply-side variables on the utilization of maternal health care services across HSCs in rural India. Since the dependent variables (the number of antenatal registrations, in-facility deliveries, and postnatal care services) are count variables and exhibit considerable variability, the data were analyzed using negative binomial regression instead of Poisson regression.

Results

The results show that those HSCs run by a contractual auxiliary nurse midwife (ANM) are likely to offer a lower volume of services when compared to those run by a permanent ANM. The availability of obstetric drugs, weighing scales, and blood pressure equipment is associated with the increased utilization of antenatal and postnatal services. The unavailability of a labor/examination table and bed screen is associated with a reduction in the number of deliveries and postnatal services. The utilization of services is expected to increase if essential facilities, such as water, telephones, toilets, and electricity, are available at the HSCs. Monitoring of ANM’s work by Village Health and Sanitation Committee (VHSC) and providing in-service training to ANM appear to have positive impacts on service utilization. The distance of ANM’s actual residence from the sub-center village where she works is negatively associated with the utilization of delivery and postnatal services. These findings are robust to the inclusion of several demand-side factors.

Conclusion

To improve maternal health care utilization at HSCs, the government shouldensure the availability of basic infrastructure, drugs, and equipment at all locations. Monitoring of the ANMs’ work by VHSCs could play an important role in improving health care utilization at the HSCs; therefore, it is important to establish VHSCs in each sub-center village. The relatively low utilization of maternity services in those HSCs that are run solely by contractual ANMs requires further investigation.

अरुंधति सूजन रॉय और फिक्शन

अरुंधति सूजन रॉय के अनुसार 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों से भरी अयोध्या से चली साबरमती एक्सप्रेस 27 फरवरी 2002 को गोधरा जंक्शन पहुचीं जहां मंदिर न बना पाने से हताश कारसेवकों ने अपने आपको डिब्बे में बंद करके किरोसीन छिड़क कर आत्मदाह कर लिया ताकि दंगा भड़काया जा सके। हा हा। वैसे आपको बता दूँ ये फिक्शन लिखती है - पर इतना बुरा और अतार्किक फिक्शन लिखती है, ये मुझे नहीं मालूम था।

Shortage of frontline health workers in Uttar Pradesh.

Originally published at Governance Now.  

Improving the availability of health workers, particularly at the sub-centre level, has been one of the thrust areas of the national rural health mission (#NRHM). 
Back in 2005, most of the sub-centres in the country were run by a single auxiliary nurse midwife (ANM). ANMs were overburdened because of rapid growth in population in previous decades and growing number of central and state sponsored health programmes. Also, because they were the sole functionary at the sub-centre level, they had to manage the sub-centre and perform field visits simultaneously, which adversely affected their performance. To reduce the burden and improve their performance, the NRHM proposed deploying an additional #ANM. The programme also persuaded state governments to enhance the availability of male health workers (MHWs), who are vital to the effective implementation of various national disease control programmes, by filling existing vacant posts. 

In 2005, when the NRHM was launched, the public health system in UP was highly inadequate and inefficient with respect to the needs of the population. Since then, the state has received thousands of crores of NRHM funding every year from the central government to improve its healthcare delivery system. However, to what extent it has been put to good use is not known. Media informs us that all is not well in UP. As per reports, the execution of the NRHM in the state has been mired by rampant corruption and misuse of funds. For instance, in 2011, about Rs 100 billion were siphoned off by politicians, bureaucrats and medical officers from the NRHM funds provided to the state. The investigation into this scandal is still underway. Moreover, the state has been unable to utilise thousands of crores allocated to it under the NRHM for the year 2015. 

Such reports can make you wonder what is going on in UP’s public health system? Has it been able to realise any of the NRHM dreams of strengthening public health system or the NRHM funds have gone down the drain? In this article, my focus is on health sub-centres, the lowest level of publicly funded health facilities in India. I ask three questions: First, has UP been able to increase the number of sub-centres to match its burgeoning rural population? Second, has it been able to provide an additional ANM and an MHW in all sub-centres as envisaged by the NRHM in 2005? Third, are there enough health worker supervisors in the system?  

Number of sub-centres
Let us first have a look at the numerical adequacy of sub-centres. As per the Indian Public Health Standards (#IPHS), ideally, the average population served by a health sub-centre (HSC) should not be more than 5,000 in plain areas and 3,000 in hilly areas. 

The terrain in #UP is not undulating, however, the population covered by HSCs is currently well above the IPHS recommendation – about 7,500 people per sub-centre. This calls for setting up more sub-centres in the state. But how many more? The number of sub-centres has increased from 18,577 in 2005 to 20,521 in 2015. Unfortunately, this growth is neither sufficient to stave off the pressure from the burgeoning population nor enough to meet the IPHS recommendation. Currently, there are over 155 million people living rural areas of the state. This means that in order to fulfil the IPHS standard for sub-centres, the state will need to establish additional 10,500 sub-centres. 

Health workers
As for health worker availability, the IPHS recommends that each sub-centre should have at least two ANMs and an MHW. Accordingly, the state should have 41,042 ANMs for its 20,521 sub-centres. Unfortunately, there are only about 23,500 ANMs positioned at HSCs, which means that most sub-centres do not have a second ANM even a decade after the NRHM was launched. This number has remained stagnant over the years. The latest district level household survey reveals that the proportion of sub-centre with two ANMs in UP is the lowest among all states. Even Bihar is ahead of UP. The lack of a second ANM at sub-centres adversely affects the performance of the existing ANM as she is forced to share her time between the headquarters (the sub-centre) and the field (villages). She is neither able to focus on maternal and child health services nor on immunisation, family planning and infectious diseases prevention activities that require her to travel to villages to cover the target population.

MHWs were introduced in the 1970s. They implement several public health measures such as collection of drinking water samples, environmental sanitation, school health, family planning, infectious disease control, adolescent health programmes, and other national health programmes. By 1990, UP was successful in recruiting enough MHWs to serve its population. Soon after, in an unwise move, the government decided to shut down all training schools for male health workers in the state. This is when the shortage of MHWs began to build up. 

The crisis that started in the early 1990s has grown despite the fact that the central government, under NRHM, promised to bear the burden recruiting MHWs provided that the state sanction and recruit a second ANM for their sub-centres. In 2005, about 69% sub-centres did not have an MHW. The situation has further deteriorated over the NRHM period. Currently, the share of such sub-centres in the state has risen to 85%. This shortage may have serious implications for the surveillance, treatment, prevention, and control of communicable diseases such as malaria, dengue, chikungunya and Japanese encephalitis in the state.

Health workers’ supervisors
The long-standing shortage of ANMs and MHWs in the state has led to a shortage of their supervisors (lady health visitor and male health assistant) as well. Each primary health centre (PHC), which usually covers six sub-centres, should have a male health assistant to supervise MHWs deployed at sub-centres. Every PHC in the state had a male health assistant in 2005, but unfortunately the situation has deteriorated since then. As of 2015, male health assistants are available only in about 28% of PHCs. The availability of lady health visitors (LHVs) in the state has not improved either. The proportion of PHCs with LHVs has declined from 89.7% in 2005 to 54.7% in 2015. As a result, the burden on existing LHVs has increased as many of them now have to supervise double the number of ANMs.  

Cause of the crisis
So, it is natural to ask what is causing this crisis in the state. Why has Uttar Pradesh not been able to improve the availability of its sub-centre level health workers even though the central government has been supportive since the launch of NRHM in 2005? 

It seems that the current health worker crisis in the state is largely a result of past health worker recruitment policies. In the 1990s, the government was convinced that they had enough ANMs and MHWs in the system. Therefore, it decided to shut down all its health worker training schools and institutes. However, when NRHM was launched in 2005, the government realised that it needed more health workers to serve its burgeoning population. The attrition of the workforce that was recruited in the 1970s and 1980s was occurring rapidly at that time, so it drew up plans to increase the number of health workers back in 2008. However, the plans never took off. 

The state could have recruited health workers for posts rendered vacant by attrition but it chose not to, mainly because training new recruits would require making a massive investment in its training institutions that have been lying defunct since the early 1990s. 

None of the 70 ANM training centres in the state are fully functional due to inadequate physical infrastructure and lack of academic and administrative staff. About 60% of all sanctioned posts for tutors at these training centres are vacant. Moreover, none of these training centres has a principal. Similarly, there are about 11 regional health and family welfare training centres and 30 Anchal Prashikshan Kendra to train MHWs. These centres were supposed to restart pre-service training and a decision in this regard was taken in 2008. However, the decision was never seriously implemented. As a result, the shortage of MHWs intensified. 
The shortage of LHVs mainly stems from non-recruitment of ANMs and dysfunctional LHV training centres in the state. ANMs who complete five years of service are given six months in-service training at these schools to get promoted to the post of LHV. For training these supervisors, there are four health schools in Lucknow, Allahabad, Agra, and Bareilly. Unfortunately, none of these training centres are currently operational, mainly due to lack of public health nurse (PHN) tutors even though a number of posts are sanctioned and the budget is available. Fresh PHN tutors are not being trained in the state because the only PHN tutor training centre in the state has not been operational since the last 27 years due to various reasons. 

The extent of apathy towards the issue of shortage of health workers prevailing in the state government and bureaucracy can be gauged from the fact there has been no increase in the number of sanctioned posts for any of the sub-centre level health workers (except ANMs) or their supervisors during 2005-2015. Even for the ANMs, the number of sanctioned posts is still way below the current requirement as per the IPHS. It is problem that the government should consider urgently because recruitments can be made only against sanctioned posts. It cannot recruit health workers arbitrarily. 
Apart from the above mentioned reasons, the huge workforce crisis that the state is witnessing is a result of the lack of vision for its rural public health facilities. Currently, the state does not have any framework for medium- or long-term health workforce planning. It is strange that the state still uses the 1991 census population to calculate the need for health facilities and health workforce. Moreover, the state also lacks a central health workforce database that could help policymakers in keeping an eye on health workforce dynamics in its public health system. 

It can be concluded that the state is suffering from a huge shortage of both health facilities and health workers even after a decade since the launch of NRHM. In fact, shortages have intensified over the NRHM period and any effort made to fill vacant positions in the state can be best described as highly inadequate and ineffective. Therefore, the government should seriously take a stock of current shortage and devise a plan to deal with the problem in a phased manner. The immediate task for the state government should be to do whatever it takes to operationalise at least some training schools, if not all, to start filling existing vacant posts as soon as possible. However, if it wishes to end the crisis of basic health workers and their supervisors within the next five years, it should think about operationalising all training schools to their full capacity. Besides, the government should establish more sub-centres and sanction new posts as per the IPHS norms. 

Singh is a researcher at Portsmouth-Brawijaya Centre for Global Health, Population, and Policy, University of Portsmouth, UK.

(The article appears in the May 16-31, 2017 issue of Governance Now)
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तेजस एक्सप्रेस

तेजस एक्सप्रेस ले आओ या महामना, भारतीय कभी नही सुधरेंगे। मैं जब भी हवाई यात्रा करता हूँ, तो एक चीज नोट करता हूँ, भारतीय होगा तो भारतीय को देख मुस्कुराएगा नहीं, खीस निपोर कर एयर होस्टेस से बार बार शराब मांगेगा। जितनी देर में एयर होस्टेस सबको नाश्ता बांट कर आती है, उतनी देर में हिंदुस्तानी अपनी गिलास खाली करके फिर से शराब मांगने के लिए तैयार हो जाता है। कहेगा फ्री मिल रही तो क्यों न पियें। हेडफोन तो छोड़ो, लोग कंबल भी उठाकर घर ले आते हैं। पब्लिक वाशरूम में से साबुन चुरा ले जाते हैं। सरकार को चाहिए कि ये बुलेट और सुपरफास्ट लक्ज़री ट्रेन का चक्कर छोड़े और वही लोहे पर जड़ी लकड़ी वाली फँटियों वाली ट्रेन ही चलाये। हिंदुस्तानी वही deserve करते हैं। हिंदुस्तानी महामना और तेजस जैसी ट्रेन्स में चलने के लायक ही नहीं हैं।

मैनचेस्टर 2017

वैसे तो मुझे किसी धर्म (रिलिजन), सम्प्रदाय, पंथ, विचारधारा इत्यादि से कोई परेशानी नहीं है, समस्या नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब कोई रिलिजन मुझे (काफिर, नॉन-बिलिवर) उसमें विश्वास न करने के लिए नरक में जलने योग्य या मृत्यु का अधिकारी बताता है। जब कोई धार्मिक (रिलीजियस) पुस्तक नॉन-बिलिवर्स खिलाफ जहर उगलती है। जब वो अपने फोलोवर्स से काफिरों के कत्ल करने का आह्वान करती है। जब कोई पंथ, सम्प्रदाय या विचारधारा दूसरों को नीचा दिखाकर खुद को श्रेष्ठ साबित करना चाहता/चाहती हो। ऐसी किताब, धर्म, पंथ, सम्प्रदाय, विचारधारा के प्रति मेरी घृणा आपको बार बार देखने को मिलेगी। चाहे वो कुरान या बाइबिल के फोलोवर्स हो, या फिर पंडो की पसंदीदा मनुस्मृति के, या फिर दास कैपिटल के दास हो, या फिर अम्बेडकर, साहू या परशुराम के। आततायी किसी भी प्रकार के हो, उनका विरोध करो, जब मौका मिले, कुचल दो। उपचार जरूरी है, नहीं तो एक दिन वो तुम्हें ऊपर पहुँचा देंगे, जैसे उन्होंने परसों मैनचेस्टर में 20 लोगों को ऊपर पहुँचाया है या कुछ दिन पहले रेड कॉरिडोर में सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया।

केवल गांधी ही क्यों?

बैंक ऑफ इंग्लैंड की करेंसी नोट्स पर रानी एलिज़ाबेथ द्वितीय के साथ साथ एडम स्मिथ की तस्वीर है, जेम्स वाट की तस्वीर है, चर्चिल की तस्वीर है, चार्ल्स डार्विन की तस्वीर है, पिन इंडस्ट्री में डिवीज़न ऑफ लेबर की तस्वीर है। हमारे यहां रुपये पर गांधी के सिवाय कोई दिखता ही नहीं। मेरा सवाल ये है कि सिर्फ गांधी ही क्यों? क्या नोटों पर हिंदुस्तान का प्रतिनिधित्व पाणिनी, आर्यभट्ट, सुश्रुत, चरक, माधव ( केरल स्कूल ऑफ मैथेमेटिक्स एंड एस्ट्रोनॉमी) इत्यादि नही कर सकते? केवल गांधी ही क्यों? क्यों हमारा गौरवशाली इतिहास हमारी नोटों और सिक्कों पर से गायब है?

Orthodox High Caste Hindus

आजकल इन्टरनेट पर होने वाली चर्चाओं में हिंदुओं में एक नया वर्ग तेजी से उभर कर आ रहा है - ऑर्थोडॉक्स ब्राह्मणों का। ये पढ़ा लिखा वर्ग है और इंटरनेट पर इसकी खास पकड़ बन गयी है। इस वर्ग का ये मानना है कि आम हिन्दू की जिन्दगी कैसी होनी चाहिए, क्या सही है, क्या गलत है, ये पुरातनपंथी रूढ़िवादी ग्रन्थ निर्धारित करेंगे। अगर कोई उनके unintelligible ग्रंथों की illogical रीजनिंग को स्वीकार न करे तो वो हिन्दू नहीं है। ये जातिवादी ब्राह्मण ये प्रचारित करने में लगे हैं कि कुछ विशेष मंदिरों में महिलाओं के अंदर जाने पर कोर्ट का प्रतिबन्ध शास्त्र सम्मत है, जाति विभेद हिंदुओं के लिए अच्छा है, इसे बनाये रखना चाहिए, इत्यादि। ऐसे पण्डे हिन्दू समाज को फिर से अन्धकार युग में धकेल देना चाहते हैं। इसलिए जहाँ मौका मिले इनका विरोध करो।

Kashmir Valley: Heaven or Hell?

लोगों को #कश्मीर पर बड़ा प्यार आता है। तारीफ करते नहीं थकते। कोई कहता है स्वर्ग है, तो कोई कुछ और। मुझे पता नहीं क्यों कश्मीर वैली से खास नफरत है। कोई फ्री का वेकेशन पैकेज भी दे तो भी मैं #मुल्लों द्वारा कब्जाई उस जमीन पर पैर न रखूँ। वैसे भी आप कश्मीर वैली की तस्वीरों से देखकर ही पता लगा सकते हैं कि कश्मीर सिर्फ उन्ही के लिए खूबसूरत है जिन्होंने दुनिया के और हिस्से नहीं देखे। दुनिया में कश्मीर वैली से कहीं ज्यादा खूबसूरत और बहुत सी जगहें है। मेरे हिसाब से जब तक मुल्ले हैं कश्मीर वैली में, वो धरती का #नर्क है और रहेगा।

Go get a room, don't do it in public.

आजकल लखनऊ एयरपोर्ट पर पूजा करते हुए एक पंडित जी की फोटो फेसबुक बहुत घूम रही है। फ़ेसबुकिया हिन्दू शेर बहुत खुश हो रहे हैं और कह रहे हैं पहली बार किसी हिन्दू को बेझिझक सार्वजानिक स्थान पर पूजा करते देखा। जबकि यही लोग फ्लाइट में मुसलमानों के नमाज़ पढते दिखाने वाली फोटो पर आपत्ति जताते हैं। इस मुद्दे पर मेरा मानना है कि सार्वजानिक स्थानों पर, रास्तों पर, सडकों पर पूजा पाठ बिल्कुल नहीं होना चाहिए। ये नियम सभी धर्मों और पंथों पर लागू होना चाहिए। मुल्ले हो या पण्डे या नव बुद्धिस्ट या सिख किसी को भी पब्लिक प्लेस में घेर कर पूजा पाठ नमाज अरदास इत्यादि की बिल्कुल भी छूट नहीं होनी चाहिए। एयरपोर्ट इत्यादि पर सर्वधर्म प्रार्थना का एक रूम होना चाहिए उसी में खूब करो जितनी नमाज़ पढ़नी हैं या पूजा करनी है। सार्वजानिक स्थानों पर रास्ता मत घेरो और नमाज़ पढ़ने के लिए अपनी चटाई मत बिछाओ। अपने इमेजिनरी फ्रेंड से बात करनी है तो घर पर करो या अपने पूजा स्थल पर करो। जैसे अंतरंग सम्बन्ध सार्वजानिक स्थान में नहीं बनाये जाते वैसे ही पूजा पाठ नमाज एकांत में ही अच्छे लगते हैं। Go get a room, don't do it in public.

पेटा (PETA) इंडिया का दोगलापन

पेटा दुनिया भर में जानवरों को एथिकल ट्रीटमेंट की बात करती है। जानवरों के क़त्ल को रोकने के लिए काम करती है। हर जगह आवाज बुलंद करती है सिवाय कुछ जगहों पर छोड़ कर।  वो कौन से ऐसे मौके हैं जब पेटा जानवरों के मुद्दे पर शांत रहना पसंद करती है? पेटा कभी भी इस्लाम या इस्लामिक देशों में हो रहे जानवरों पर अत्याचार के खिलाफ आवाज नहीं उठाता है। इस्लाम में कई ऐसे त्यौहार हैं जब लाखों करोड़ों की तादाद में जानवर काटे जाते हैं पर पेटा के ऑफिस से कोई अपील नहीं आती जो इस खून खराबे को बंद करने के लिए अपील करे। दूसरी तरफ जहाँ पर पेटा को लगता है कि विरोधी शांतप्रिय है और उनके खिलाफ अभियान चलाने में उसका और उसके वालंटियर्स का कुछ नहीं बिगड़ेगा, वो पूरे तामझाम के साथ प्रोट्रस्ट करने लग जाते हैं। ऐसा ही कुछ भारत में हुआ। दक्षिण भारतीय हिंदुओं की सांस्कृतिक धरोहर बुल रेसिंग पर पेटा ने अपना अभियान शुरू किया और बात को सुप्रीम कोर्ट तक ले गए और जल्लीकट्टू पर कानूनी रोक लगवा दी। पर पेटा की ये हिम्मत नहीं है कि बकरीद जो कि मुसलमानों का त्यौहार है के दौरान करोड़ों जानवरों के क़त्ल पर कोर्ट जाकर पर रोक लगवा दें। क्योंकि पेटा को मालूम है मुस्लमान न केवल उनके वालंटियर्स को जान से मार देंगे बल्कि पेटा को अपना ऑफिस बंद कर अपने देश लौटना पडेगा।
अभी कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश में बीजेपी सरकार आने के बाद गैर कानूनी स्लॉटर हाउसेस को सरकार ने बंद करवा दिया, पर अभी तक पेटा की इस  पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है - न ख़ुशी की, न दुःख की। कारण जानते हैं? क्योंकि उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री हिन्दू है और बीजेपी हिंदुओं की तरफ झुकाव रखने वाली पार्टी है। पेटा इंडिया में बैठे लोग सिर्फ हिंदुओं से नफरत करते है, परंतु इस्लाम के खिलाफ बोलने में उनको डर लगता है। नेपाल में हिंदुओं के पर्वो के दौरान पशुओं के क़त्ल को तो पेटा अंतर्राष्ट्रीय स्तर जोर शोर से उठाती है, पर बकरीद पर होते खून खराबे पर ये चुप रहते हैं। पेटा की इसी हिपोक्रिसी की वजह से मैं अब इस संस्था को बिलकुल पसंद नहीं करता।

इंटरव्यू की तैयारी कैसे करें: कुछ महत्त्वपूर्ण बिंदु


यदि आप पहली बार किसी इंटरव्यू में भाग लेने जा रहे हैं तो जाहिर है आप थोड़ा नर्वस तो होंगे ही। लेकिन किसी इंटरव्यू में सफल होना कोई बड़ी बात नहीं है अगर आप निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें

पूर्व तैयारी - किसी भी इंटरव्यू में जाने से पहले आपको कई प्रकार की तैयारियां करनी पड़ती हैं - अपने अब तक के करियर या शिक्षा के बारे में पूर्ण जानकारी होनी चाहिए।  अगर आपको शक हो कि आप अपने पूर्व करियर का अच्छे से वर्णन नहीं कर पर रहे हैं तो आपको उसकी तैयारी कर लेनी चाहिए। अपने पूर्व करियर के बारे में कभी नेगेटिव न सोचे भले ही आप ने किसी छोटी कंपनी में नौकरी की हो या खेती किसानी की हो - साक्षात्कार में हमेशा अपने कार्यों को एक सकारात्मक नज़रिये से प्रस्तुत करें और इस तरीके से प्रस्तुत करें जिससे साक्षातकर्ताओं को मालूम पड़े कि आपने अपनी जॉब में कई महत्वपूर्ण चीजे सीखी है जो आपकी स्किल्स को अच्छा करने में सहायक साबित हुई हैं।

इंटरव्यू में आपकी ड्रेस महत्वपूर्ण होती  हैं - शिक्षा या कॉर्पोरेट क्षेत्र में साक्षात्कार देने जाने के लिए निम्न बातों का ध्यान रखें - आपकी ड्रेस ज्यादा चमकीली और कसावदार नहीं होनी चाहिए  और न ही बहुत ढीली। लड़के अपने बालों को छोटा और कंघी किया हुआ रखें। बीच से मांग निकालने से बचें। यदि आपको टाई नहीं पसंद है, या उसमे सहज महसूस नहीं करते हैं तो मत लगाएं। बेल्ट सिंपल होनी चाहिए। चमड़े के काले जूते पहनने चाहिए - अगर आपको इस प्रकार के फॉर्मल ड्रेस पहनने की आदत नहीं है तो आप एक दो महीने पहले से इन्हें पहनने की आदत डालिये। नाखून कटे हुए होने चाहिए और क्लीन शेव करके जाना चाहिए। अगर क्लीनशेव की आदत नहीं तो कई महीने पहले से इसकी आदत डालें।

इंटरव्यू में जाने से पहले कभी ये न सोचे कि आपका सिलेक्शन नहीं हो पायेगा या हो पायेगा।  इंटरव्यू को एक चैलेंज के तौर पर लें और हमेशा नेचुरल एंड पॉजिटिव रिस्पांस दें। एक सवाल जो अक्सर पुछा जाता है कि आप अगर टीम में काम कर रहे हैं और आपका एक साथी बहुत ही आलसी है तो आप उससे कैसे निपटेंगे। ऐसे सवाल काफी चैलेंजिंग होते हैं। जाहिर है कि कोई भी इंटरव्यू लेने वाला ऐसा कर्मचारी नहीं लेना चाहेगा जो ये जवाब दे कि मैं उस अलसी साथी को वार्निंग देकर निकाल दूंगा और किसी दूसरे व्यक्ति को चुनुंगा। आपका जवाब ये होना चाहये कि मैं उससे बात करूँगा और उसकी परेशानी समझने की कोशिश करूँगा - हो सकता है कि उसे कोई शारीरिक या मानसिक या पारिवारिक या किसी और तरीके को समस्या हो जिसकी वजह से वह अपना पूरा ध्यान काम में न लगा पाता हो - मैं उसकी समस्याओं को जानकार उसकी समस्याओं को दूर करने का प्रयास करूँगा और उसे काम में मन लगाने के लिए उत्साहित करूँगा।

कभी भी अपने आपको ऐसा दिखाने की कोशिश न करें जो आप हैं नहीं।  आप में काफी कमिया भी होंगी जिन्हें आपको जब पूछा जाय तो बताना चाहिए पर ये धयान रखना चाहिए कि कमियों को कुछ इस प्रकार से बताएं कि वो कमिया भी आपकी पॉजिटिव पॉइंट लगें। जैसे भावुक होना एक कमी हो सकती हैं पर भावुक होना कभी कभी आपको दूसरे की समस्याएं समझने में मदद भी करता है - यही चीज आपको इंटरव्यू लेने वालो को कहानी है कि मैं भावुक तो हूँ पर कभी कभी अपने साथियों की परेशानियों को समझने में और सहारा देने में यह कमी एक पॉजिटिव पॉइंट बन जाती हैं।



हिन्दू और शिरडी बाबा

अब से कोई शिरडी वाले साईं बाबा की तस्वीर शेयर करते दिख गया तो वही ब्लॉक कर दिया जायेगा। क्या हिन्दुओं में देवी देवताओं की कमी है जो बाबाओं, ढोंगियों, मुल्लों, मौलवियों इत्यादि की फोटो शेयर किए जा रहे हो? कुछ लोगों के पूजा घरों तक भी साईं बाबा पहुँच गए हैं - लोगों ने उस आदमी को पूजाघर में शिव, पार्वती, गणेश, हनुमान के बीच बिठा दिया है। कुछ हिन्दू तो शिरडी की बाकायदा यात्रा करके लाखों का चढ़ावा चढ़ाकर आते हैं बिना ये जाने कि वो चढ़ावा कहाँ जाता है किस काम में लगता है। ये हिन्दू जिसकी देखो उसी की पूजा करने लग जाते हैं। कोई ईसाई मिशनरी अगर जीसस की फोटो यह कहकर थाम जाये कि जीसस बिगड़े हुए सारे काम बना देते हैं तो झटपट इस प्रकार के हिन्दू जीसस उस फोटो को अपने पूजाघर में रखकर उस पर रोज अगरबत्ती जलाने लग जाते हैं। दुनिया में इतनी मूर्ख कोई और कौम नहीं देखी आजतक मैंने, सच में।

मंदिर को स्वतंत्र करना ही पड़ेगा।

मुस्लिम आक्रांताओं ने गुजरात में सोमनाथ तोड़ा और लूटा, कश्मीर में मार्तण्ड सूर्य मंदिर तोड़ा, काशी में विश्वनाथ मंदिर तोड़ ज्ञानवापी मस्जिद बनाई, मथुरा में कृष्णजन्मभूमि मंदिर तोड़ मस्जिद बनाई, अयोध्या में रामजन्मभूमि में मंदिर तोड़ मस्जिद बनाई, 27 मंदिरों को तोड़ क़ुतुब काम्प्लेक्स में कुव्वतुलइस्लाम मस्जिद बनाई। ये तो बस कुछ उदाहरण दिए हैं ऐसे हज़ारों मस्जिदें हैं जो मंदिरों को तोड़ कर बनाई गयी हैं। क्या भारत के मुसलमानों का यह नैतिक दायित्व नहीं बनता कि वे मंदिरों की जमीन को मस्जिदों से स्वतंत्र करें? क्या कभी मुसलमान इस बात को स्वीकार सकता है कि सऊदी अरब में मुहम्मद के जन्मस्थान से सटकर एक शिवमंदिर बना दिया जाये? यदि नहीं तो काशी मथुरा और अयोध्या में मंदिरों से सटी हुई मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा बनाई मस्जिदों को हिन्दू कैसे स्वीकार सकते हैं? मंदिर को स्वतंत्र करना ही पड़ेगा।

रिश्ते बहुत महत्वपूर्ण होते हैं इन्हें टूटने से बचाएँ। पैसे के घमंड में आकर रिश्ते न तोड़े।

अपने जीवन में आप एक गाँठ बाँध लें कि आप अपने जानने पहचानने वालों, रिश्तेदारों इत्यादि को कभी भी किसी भी तरीके से अपमानित न करें क्योंकि आपकी वो बात जो आपको छोटी लगती है किसी के दिल में ऐसा घाव कर जाती है जो जिंदगी भर नहीं भर पाता है। मैंने बहुत बार देखा है कि हम अपने से छोटे लोगों को डाँट देते हैं, उन्हें भला  बुरा बोल देते हैं, कभी कभी तो लोग अपने से उम्र में छोटे लोगों को गालियाँ तक दे देते हैं। ऐसा करना से रिश्ते बिखर जाते हैं। उम्र में छोटा व्यक्ति भले ही आपका लिहाज करने की वजह से आपकी गलियों का जावब गाली से न दे परंतु वह उन गलियों से उत्पन्न घाव को जिंदगी भर याद रखता हैं। आपको लगता है कि आज आपके पास पैसा है और उम्र में छोटे भाई या बहन की सहायता कर आप उस पर अहसान कर रहे हैं तो ऐसा बिलकुल भी नहीं है और इसकी वजह से आपको अपने भाई या बहन को अपमानजनक शब्द कहने का लाइसेंस मिल जाता है तो आप गलत हैं।  हमारे समाज में बड़े होने का मतलब अक्सर ये लगाया जाता हैं कि उनके अपने से उम्र में छोटो को कुछ भी कहने का अधिकार है। ऐसा नहीं है। आप चाहे जितने ही बड़े क्यों न हो, चाहे जितने ही पैसे वाले क्यों, आपने चाहे जितनी ही अपने भाई बहन की सहायता क्यों न की हो, आपको उनकी बेइज्जती करने का अधिकार नहीं है। रिश्ता कोई भी हो, चाहे माँ ही क्यों न हो अपने बच्चे को जलील, अपमानित करने का अधिकार उसे भी नहीं है। और अगर बड़े अपने से छोटों को जलील करते हैं तो ये याद रखिये कि छोटे उस बाद को कभी भी नहीं भूलते हैं - वह बात उनके दिल में रहती है - जिंदगी में जब कभी समय बदलेगा, उसके भी अच्छे दिन आएंगे, तब हो सकता है वह अपनी बेइज्जती का बदला आपकी बेइज्जती करके ले। इसलिए अगर आप किसी की किसी भी तरह की सहायता करते भी हैं, तो ये मत सोचे कि दूसरा व्यक्ति आपका गुलाम हो गया है, आप उसे कैसे भी ट्रीट कर सकते हैं, आप उसे गली दे सकते हैं उसकी बेइज्जती कर सकते हैं।  नहीं आप नहीं कर सकते ऐसा कुछ।  और ऐसा करते भी है तो भविष्य में अपने साथ भी वैसा ही व्यवहार होगा इसके लिए तैयार रहे। रिश्ते बहुत महत्वपूर्ण होते हैं इन्हें टूटने से बचाएँ। पैसे के घमंड में आकर रिश्ते न तोड़े। 

वामपंथी चिंतित है कि एक के बाद एक दक्षिणपंथी हर देश में सत्ता पर काबिज होते जा रहे हैं।

दुनिया भर में वामपंथी चिंतित है कि एक के बाद एक दक्षिणपंथी हर देश में सत्ता पर काबिज होते जा रहे हैं। वे इसका दोष दक्षिणपंथियों पर मढ़ देते हैं, पता नहीं क्यों? अगर आप ध्यान से देखें तो दक्षिणपंथियों के सत्ता में आने का मुख्य कारण वामपंथ और उनके साथियों (भारत में सेकुलरिज्म के स्वघोषित झंडाबरदार कांग्रेस और उनके साथी) का अर्थव्यवस्था सहित हर मोर्चे पर विफल होने रहा है। आज तुष्टीकरण, hypocrisy वाम के रग रग में बसी है चाहे भारत हो या कनाडा या फिर फ्रांस या अमरीका। दुनिया में कहीं भी जाइये लाल रंग हरे रंग के मानवता के प्रति किये गए अपराधों पर मानवाधिकारों का पर्दा डालता हुआ मिलेगा इसके बावजूद कि जब भी हरा रंग बहुमत में होता है तो लाल रंग को मौत के घाट उतार देता है। हरे रंग वाले 52 देशों में लाल रंग का नामोनिशान नहीं है और अगर है भी तो काला हो गया होगा। लाल रंग को आत्ममंथन की जरुरत है, न कि दक्षिणपंथ पर आये दिन झूठे आरोप लगाने की और जनता के बहुमत द्वारा चुनी गयी सरकारों के खिलाफ आये दिन धरना देने की। ऐ, लाल झंडा ऊँचा करने वालों, तुम जितने बेबुनियाद आरोप लगाओगे, धरने दोगे, दक्षिणपंथ की सियासी उम्र उतनी ही बढ़ती चली जायेगी। संभल जाओ, तुम्हे मालूम है न, कि लाल रंग का वजूद हरे रंग में आकर मिट कर काला हो जाता है, काला रंग यानी अँधेरे का प्रतीक। क्यों हरे रंग के चक्कर में अपने और इस मानवता को अँधेरे में धकेल रहे हो? जागो, तुम तो समाज को प्रगतिशील और समतामूलक बनाना चाहते हो न, उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कार्य करो, न कि धरने और अरोपबाजी। हरे रंग के प्रति अगाध प्रेम से तुम्हे कुछ नहीं मिलेगा, कालिख के सिवाय। जागो अगर चाहते हो कि मानवता का भविष्य कहीं अंधकारमय न हो जाये तो।

जब कोई सलाह मांगे, सलाह दीजिये, भूल जाइए और खुश रहिये।

एक कहावत है सुनो सब की, करो मन की। कहावत तो अपने देश की ही है पर इस कहावत को हम अक्सर अपनी जिंदगी में इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं, उतार नहीं पाते है। क्यों? क्योंकि अगर आप अपने मन की करने लगते हैं तो आपसे उम्र में बड़े लोग जिनसे आपने सलाह ली है वो नाराज़ हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि आप उनकी अवमानना कर रहे हैं, उनका अनादर कर रहे हैं। वो इस बात से परेशान रहते हैं कि आपने उनकी सलाह/बात नहीं मानी। उन्हें लगता हैं कि वो बड़े है इसलिए उनकी सलाह आपको माननी ही चाहिए। बजाय ये समझने के कि आप उनकी सलाह पर अमल क्यों नहीं किया, ज्यादातर लोग आप के सलाह न मानने को अपनी बेइज्जती/इंसल्ट के तौर पर ले लेते हैं। वो मुंह फुलाकर बैठ जाते हैं, आपसे बात नहीं करते हैं।
मुझे लगता है कि अगर किसी ने सलाह मांगी चाहे वह छोटा हो बड़ा, आपका काम है सलाह देना, न कि ये आशा रखना कि आपकी सलाह ही उसके लिए सर्वश्रेष्ठ है और उसे उस पर अमल करना ही चाहिए। हमेशा याद रखिए कि किसी व्यस्क को बिना मांगे सलाह देने की आदत अच्छी नहीं होती है। अक्सर आप सलाह बिना मांगे सलाह देते हैं क्योंकि आपको लगता है आप उसके शुभ चिंतक है, पर जरुरी नहीं जिसे आप अपनी सलाह दे रहे हैं वो भी सोचता हो कि आपके उसके शुभ चिंतक हैं। आपको लगने से कुछ नहीं होता है। अगर सलाह देनी है तो उस व्यक्ति के साथ अपना कम्युनिकेशन मज़बूत करें और उसके विश्वस्त बनें।
अगर कभी आप अपने मित्रों, भाइयों, बहनों, बेटे, बेटियों को भी बिना सलाह बिना मांगे देते हैं तो भी आपका का कोई अधिकार नहीं बनता कि आप उस व्यक्ति पर ये दबाव डालें कि वो आपकी सलाह माने ही या ये आशा रखें कि वो आपकी सलाह मानेगा ही। हर व्यस्क व्यक्ति अपने जीवन के निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है। उसको आप मुताबिक नहीं चला सकते हैं। सलाह देनी है दे दीजिए फिर आप काम में जुट जाइये। वो सलाह माने या माने, उसकी मर्जी। अगर आपकी सलाह नहीं मानी जाती है तो आपको दुखी नहीं होना चाहिए। क्यों दूसरों के एक्शन्स को लेकर अपनी जिंदगी के दुःख बढ़ाने? क्या आपकी अपनी जिन्दगी के दुःख जूझने के लिए कम हैं? आपको उस व्यक्ति पर नाराज़ भी नहीं होना चाहिए। उसकी अपनी स्वतंत्रता है। आपको बेइज्जत भी नहीं महसूस करना चाहिए।
बस जब कोई सलाह मांगे, सलाह दीजिये, भूल जाइए और खुश रहिये।

क्या उत्तर प्रदेश में बीजेपी का बहुमत प्रदेश की स्थिति में सुधार ला पायेगा?

उत्तर प्रदेश में चुनाव के रिजल्ट्स आने के बाद से अब तक कई दिन बीत चुके हैं पर भारतीय जनता पार्टी अभी तक अपने मुख्यमंत्री को नहीं चुन पायी है।  मुख्यमंत्री के पद के लिए कई चेहरे चर्चा में है पर मेरे विचार से उत्तर प्रदेश बीजेपी में कोई भी ऐसा चेहरा नहीं है जिसके पास प्रदेश के भविष्य को लेकर कोई विज़न हो। इन चेहरों के पिछले रिकॉर्ड देखने से भी कुछ पता नहीं चलता। बहुत से लोग योगी आदित्य नाथ को मुख्यमंत्री बनाने के समर्थन में है पर मुझे लगता नहीं कि प्रधानमन्त्री मोदी आदित्यनाथ को ये जिम्मेदारी सौंपेंगे। आदित्यनाथ व्यक्तित्व के भले ही धनी हों, अपने क्षेत्र में भले ही उनका सिक्का चलता हो पर प्रदेश सँभालने के लिए उसकी अर्थव्यवस्था को लाइन पर लाने के लिए एक दूरद्रष्टा की जरुरत है।  देश के विकास के संकेतकों की बेहतर बनाने के का रास्ता उत्तर प्रदेश से गुजरता है जहाँ देश की १६% जनसँख्या रहती है। २० करोड़ से ज्यादा वाले इस प्रदेश में तरक्की का मतलब देश की तरक्की है लेकिन बड़ा सवाल अभी है कि योगी आदित्यनाथ या मनोज सिन्हा या जो भी प्रदेश के मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठता है, क्या वो व्यक्ति उत्तर प्रदेश में कुछ त्वरित परिवर्तन ला पायेगा? प्रदेश में सरकारी स्वास्थ्य और शिक्षा तंत्र एकदम  लचर अवस्था में है। अगर योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बना दिया जाए तो क्या वो इन दो क्षेत्रों को अपनी प्राथमिकताओं में रख पाएंगे? क्या वे पुलिस की गुंडागर्दी और गुंडों की गुंडागर्दी पर लगाम लगा पाएंगे। क्या वो कृषि में जरुरी परिवर्तन ला पाएंगे? क्या वे परिवहन व्यवस्था में जान फूँक पाएंगे? क्या वे भुखमरी पर लगाम लगा पाएंगे? 

छोटी सी जिंदगी है। हँसो, मुस्कुराओ, खुश रहो।

किसी पर चिल्लाने से, गुस्सा करने से कोई काम नहीं बनता है, उल्टे अक्सर काम बिगाड़ जाते हैं, और जिस पर आप चिल्ला रहे होते हैं उसके साथ आपके संबंधों में गाँठ पड़ जाती है। अक्सर मैं देखता हूँ हमारे समाज में लोग सिर्फ इसलिए दूसरों पर गुस्सा उतारते हैं चिल्लाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है वो उम्र में बड़े हैं, बॉस है, अध्यापक हैं, माँ हैं, बाप हैं, बड़े भाई हैं, बड़ी बहन हैं इसलिए चिल्लाने का गुस्सा करने का उनका हक है। नहीं, ऐसा कुछ नहीं है, आपका कोई हक नहीं बनता है।
हर व्यक्ति स्वतंत्र है। आपका पुत्र, पुत्री, भाई, बहन, विद्यार्थी, कर्मचारी इत्यादि होने का ये मतलब नहीं कि वो आपका गुलाम है। अगर कोई गलती होती है, कोई काम बिगड़ता है तो जोर जोर से चीखने से, चिल्लाने से कोई काम बन नहीं जायेगा, बल्कि और बिगड़ जायेगा। केवल काम ही नहीं, आपका और आप जिस पर चिल्ला रहे होते हैं, दोनों का दिमाग भी बिगड़ जाता है, चित्त की शांति भंग हो जाती है। उत्पादकता कम हो जाती है।
चिल्लाने से कुछ नहीं सुधरता है, बल्कि जिसने गलती की हैं उसके मन में आपके लिए एक घृणा पैदा होती है, आपके रिश्ते में एक गाँठ पड़ जाती है, और कभी कभी ये गाँठ पूरी जिंदगी पड़ी रहती है। यदि कभी आप चिल्लाते और गुस्सा करते भी हैं तो वो क्षणिक होना चाहिए और आपको दूसरे व्यक्ति से तुरंत क्षमा मांगनी चाहिए ताकि उसे भी पता चले कि आप अपने व्यवहार पर शर्मिंदा हैं।
सबका अपना जिंदगी जीने का तरीका है, सब अपने किये का फल पाएंगे, आपको चिल्लाने और चीखने की कोई जरुरत नहीं है। अगर आप बॉस है आपका का काम बिगड़ता है तो आप बिना कुछ गुस्सा किये कर्मचारी की छुट्टी कर सकते हैं। अगर आप बड़े हैं, तो सिर्फ अपना काम कीजिये, छोटों पर धौंस जमाने और चिल्लाने का आपको कोई हक नहीं। अगर आप अध्यापक हैं तब आपको बिलकुल भी चिल्लाना नहीं चाहिए, संयम से काम लें और जिस बच्चे ने आपके अनुरूप कार्य नहीं किया है या नियम तोड़े हैं उससे आराम से बात करें समझाएं, और फिर भी न माने तो जरूरी कागजी कार्यवाही करें। चिल्लाने और डांटने का कोई हक नहीं है।
आपको सिर्फ इतना हक़ है कि आप अपनी बात संयमित ढंग से प्यार से सामने वाले के सामने रखें, बस। याद रखें, यदि आप ऊँचे पद पर हैं तो अपनी आवाज नीचे रखें और दिमाग में शांत बनाएं रखें, जिन्दगी में बहुत आगे जाएंगे।
छोटी सी जिंदगी है। हँसो, मुस्कुराओ, खुश रहो। क्या मालूम कब ऊपरवाला ऊपर बुला ले।

My Nainital Trip


Naini lake from Tiffin Top

Naini lake from Naina Devi temple

Evening in Nainital

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