Islam and Christianity in India

हिन्दुओं को समझ में क्यूँ नहीं आता कि इस्लाम और क्रिश्चियनिटी बहुदेववाद और मूर्तिपूजा, जो कि हिन्दू धर्म के मूल तत्वों में से हैं, के खिलाफ है - इस्लाम और ईसाईयत की स्थापना हुई ही बहुदेववाद और मूर्तिपूजा को धरती से पूर्णतः मिटाने के लिए थी - इस्लाम इस समस्त धरती को दारुल-इस्लाम (इस्लाम का घर/क्षेत्र) बनाना चाहता है - उसके लिए ऐसे क्षेत्र जहाँ इस्लाम नहीं पहुंचा है वो दारुल-हर्ब (मूर्तिपूजको या बुतपरस्तों का घर/क्षेत्र) हैं जिनमें इस्लाम के प्रसार का युध्ह चल रहा है - जो लोग बहुदेववाद और मूर्तिपूजा में विश्वास करते हैं उन्हें इस्लाम और ईसाईयत में दंड का प्रावधान है - इस्लाम और ईसाईयत की पवित्र किताबें ऐसे लोगों पर विश्वास न करने को कहती हैं - ये भी उल्लेख है कि बहुदेववाद और मूर्तिपूजा में विश्वास करने वाले यानी काफ़िर (हिन्दू, बुद्धिस्ट, जैन, सिख इत्यादि) नरक में जलेंगे - मुल्लों और ईसाईयों में आप आपके मंदिर, ईश्वर, मूर्तिपूजा, रहन सहन के प्रति जो घृणा देखते हैं उसके पीछे कारण है - ये घृणा ऐसे ही नहीं उत्पन्न होती - इस घृणा का स्रोत उनकी धार्मिक किताबें हैं - उनका रिलिजन जन्मा ही बहुदेववाद और मूर्तिपूजा की घृणा से था - अगर वो आज आपके घरों पर पत्थर फेंक रहे हैं या सड़क पर सो रहे लोगों पर गाड़ी चढ़ा दे रहे हैं या आपकी माँ बहनों का बलात्कार कर रहे हैं या बंदूके उठाकर लोगों को सीने सरे आम छलनी कर रहे हैं या आत्मघाती हमले कर रहे हैं या हिन्दुओं के मंदिरों और मूर्तिओं को छिन भिन्न कर रहे हैं या आपके मूर्तिपूजक होने पर सवाल कर रहे हैं उसका मजाक उड़ा रहे हैं तो आपको मालूम होना चाहिए कि इन सब के पीछे मुल्ले हैं और मुल्ले कुरान और हदीस का अक्षरशः पालन करते हैं - आँखें खोलो, नहीं तो जैसे मुल्लों ने सिखों और हिन्दुओं को लाहौर से मार भगाया था, उनकी औरतों बहनों माँओं की इज्जत लूट कर मौत के घाट उतार दिया था या जैसे कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम किया था या जैसे बांग्लादेश में १९७१ में हिन्दुओं का बलात्कार क़त्ल किया था वैसे ही आपके या आपके बच्चों का बलात्कार या क़त्ल होगा - इस्लाम और ईसाईयत को जितना हो सके दबाकर रखो, हिन्दुओं, सिखों, जैनियों, बुद्धिस्टों इसी में तुम्हारी और तुम्हारी एकमात्र भूमि भारत की भलाई है - भारत के तीन टुकडे पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश दारुल इस्लाम यानी इस्लामिक राष्ट्र बन चुके हैं - वहाँ तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है - अपनी भलाई चाहते हो तो आँखें खोलो - ईसाईयत और इस्लाम के बारे में पढो, जानो, और सुरक्षित रहो - १४०० साल की गुलामी करने के बाद भी क्यूँ सोये पड़े हो - क्यूँ जातियों में बंटे पड़े हो - उठो जागो नहीं तो भारत के नाम पर जो छोटा सा टुकड़ा है वो भी मुल्लों और ईसाईयों के हांथो में चला जायेगा
डिस्क्लेमर: मैं अनीश्वरवादी हूँ

Islamism in Indian villages

बिना मूँछ की दाढ़ी वाले कट्टरपंथी मुल्लों ने हमारे शहरों गावों हर जगह अपना जाल बिछा लिया है। हर एक गाँव में जहां मुसलमानों की आबादी थोड़ी बहुत भी है मस्जिदें उग आयीं हैं, मदरसे उग आए हैं, पांच समय की नमाज़ बाकायदा लाउडस्पीकर पर हो रही है। मस्जिदों के मुल्ले बड़ों के दिमाग में और मदरसों के आलिम बच्चों के दिमाग में कचरा भर रहे हैं। वे मुसलमानों के दिमाग में, उन लोगों के खिलाफ जिनके साथ वो सदियों से रह रहे हैं, जहर भर रहे हैं। ये आज नही शुरू हुआ। जब गाँव मे मुल्ले नही थे, मस्जिदे नही थी, मदरसे नही थे, लोग आपस मे प्यार से मिलते थे, रहते थे। मेरे पिताजी अक्सर हरदोई जिले के एक गाँव का उदाहरण देते हैं। उस गाँव में उन्होंने कुछ समय बिताया रहा होगा। वो बताते हैं गांव में सब कुछ बढ़िया था, लोग आपस मे मिलते जुलते थे, एक दूसरे के त्योहार मनाते थे, कोई मुसलमान बिना मूँछ वाली दाढ़ी नहीं रखता था और न ही टखनों से दो इंच छोटा पजामा पहनता था। लोग मज़ार, मंदिर सबको एक जैसा मानते थे। फिर एक दिन गाँव में पता नहीं कहाँ से एक मुल्ला आया, टखने से दो इंच छोटा, सफेद पजामा पहनने वाला, बिना मूँछ की दाढ़ी वाला। उसने मदरसा और मस्जिद खोली। लोगों को नमस्ते और जय राम की जगह खुद हाफिज और अल्ल्लाह हाफिज कहना सिखाया। मुसलमानों में ये जहर भरना शुरू किया कि जिनके साथ तुम इतने घुल मिल कर रहते हो वो काफिर हैं, उनके साथ नही रहना चाहिए इत्यादि। धीरे धीरे गाँव मे धार्मिक उन्माद बढ़ता गया। झगड़े बढ़ने लगे। चोरी चपारी बढ़ गयी। अब लोग एक दूसरे नमस्ते भी न करते, एक सलाम वाले कुम कहता तो दूसरा जय राम। लोगों में बिना मूँछ की दाढ़ी वालों की संख्या में इज़ाफ़ा हो गया। बच्चे सरकारी स्कूल छोड़ मदरसे जाने लगे, विज्ञान गणित छोड़ अरबी की कुरान रटने लगे। एक दूसरे से मिलने की बजाय लोग मस्जिदों में मुल्ले के साथ गुज़ारने लगे। एक अच्छा खासा गाँव बर्बाद हो गया। मुल्ले ने जहर भर दिया।
आज ये प्रक्रिया बहुत तेजी से चल रही है। पड़ोस के दो गांवों में जहां मुसलमान ज्यादा थे आज से कोई 6-7 साल पहले कोई मस्जिद न थी, लेकिन आज बाकायदा 5 समय की नमाज लाउडस्पीकर पर होती है जबकि उस इलाके में एक भी मंदिर नहीं है जो रोज या हफ्ते में एक बार भी लाउडस्पीकर पर कोई धार्मिक संगीत या गीत बजाता हो। मदरसे भी उग आए हैं। जो खुदा हाफिज कहते थे, आज अल्लाह हाफ़िज़ कह रहे हैं। जिसे लोग रमजान कहते थे, आज अरबों की नकल करते हुए उसे रमादान कह रहे हैं। जो बच्चों को स्कूल भेजते थे, आज मदरसे में कुरान रटवाने भेज रहे हैं। फिर कहते हैं मुसलमान पिछड़ा है, नौकरी नही मिलती। कैसे मिलेगी नौकरी जब बच्चों को कुरान रटवाओगे, अरबी जबरदस्ती सिखाओगे, और मुल्लों के मदरसे भेजोगे। लड़कियों की क्या हालत कर के रख दी हैं इन मुल्लों ने इस पर मैं जाना नहीं चाहता। ये लेख बहुत लंबा हो जाएगा। जो महिलाएं घर से बाहर निकलती थी, बिना किसी झिझक के कहीं भी चली जाती थीं। मुल्लों, मदरसों और मस्जिदों के उग आने के बाद घरों में बंद रहती हैं, घर से निकलती भी हैं काले बोरों में। मुसलमानो की आधी आबादी गुलामी में जी रही है। मुल्लों, मदरसों और मस्जिदों के संख्या में गुणात्मक वृद्धि के साथ महिलाओं के अधिकारों में भारी कटौती हुई है। गाँव में अब हर मुसलमान औरत काले बुर्के में मिलती है। कोई नही जानता उसके भीतर किसकी बहन, माँ, या भाभी है, या फिर कहीं कोई आतंकवादी तो नही। हिंदुओं ने जहां घूंघट बहुत हद तक त्याग दिया है, मुस्लिम महिलाओं को बुर्के पहनने पर मजबूर किया जा रहा है, उनकी संख्या में भयंकर वृद्धि मालूम पड़ती है।
गाँवों में मुल्लों, मस्जिदों और मदरसों के बढ़ती पैठ हमारे समाज के लिए खतरनाक है। इसको कोई रोक भी नही सकता। ये ऐसी बाढ़ है जो आज नही तो कल आपके के गाँव या शहर में भी आएगी। और तबाही का मंजर लाएगी। मुल्लों का मकसद आम जनता को समझ नही आता - मुल्लों का अंतिम लक्ष्य है इस काफिरों की धरती को एक दिन दारुल-इस्लाम में परिवर्तित करना। यही लक्ष्य ईसाई मिशनरियों का भी है - भारत को हिन्दू रहित करना - ईसाईयत का गढ़ बनाना। और हिन्दू सो रहा है, उसे अपनी जति, उपजाति, गोत्र, उपगोत्र इत्यादि से छुटकारा ही नहीं मिल रहा।